दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे शिशु का जिला अस्पताल बीजापुर में सफल इलाज
बीजापुर।जिला अस्पताल बीजापुर में डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद दुर्लभ और जानलेवा त्वचा रोग से जूझ रहे नवजात शिशु को अनोखे और सावधानीपूर्वक उपचार के जरिए नई जिंदगी दी है। यह मामला न सिर्फ चिकित्सकीय दृष्टि से चुनौतीपूर्ण था, बल्कि संसाधनों की सीमाओं के बीच मानवीय संवेदनशीलता और चिकित्सकीय कुशलता का भी उदाहरण बनकर सामने आया है।
गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचा नवजात
ग्राम कोरसागुड़ा (विकासखंड उसूर) निवासी शांति मोटू पूनेम के नवजात शिशु को 4 अप्रैल को गंभीर अवस्था में जिला अस्पताल बीजापुर में भर्ती कराया गया। शिशु की त्वचा तेजी से छिल रही थी और शरीर पर जलने जैसे घाव बनते जा रहे थे। प्रारंभिक जांच के बाद डॉक्टरों ने शिशु को स्टैफिलोकोकल स्केल्ड स्किन सिंड्रोम (SSSS) नामक अत्यंत दुर्लभ बीमारी से पीड़ित पाया।
क्या है यह बीमारी?
यह एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण है, जिसमें त्वचा की ऊपरी परत कमजोर होकर छिलने लगती है। शरीर पर जलने जैसी स्थिति बन जाती है और संक्रमण तेजी से फैलता है। नवजातों में यह बीमारी बेहद खतरनाक मानी जाती है और समय पर इलाज न मिले तो जान का खतरा भी हो सकता है।
25 दिनों तक चला गहन उपचार
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. नेहा चव्हाण के नेतृत्व में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की टीम ने लगातार 25 दिनों तक शिशु का गहन उपचार किया। इस दौरान एंटीबायोटिक थेरेपी, फ्लूड मैनेजमेंट और विशेष निगरानी के साथ संक्रमण को नियंत्रित करने की कोशिश की गई।
केले के पत्तों से मिला सहारा
उपचार का सबसे अनोखा और प्रभावी पहलू रहा—केले के पत्तों का उपयोग।
डॉ. नेहा चव्हाण के अनुसार, इस बीमारी में त्वचा बेहद नाजुक हो जाती है, इसलिए किसी भी तरह के घर्षण से बचाना जरूरी होता है। इसके लिए स्वच्छ और स्टरलाइज किए गए केले के पत्तों को बिस्तर के रूप में इस्तेमाल किया गया।
इन पत्तों पर शिशु को इस तरह रखा गया कि उसकी त्वचा को मुलायम सतह मिले और रगड़ कम हो। साथ ही नियमित अंतराल पर पत्तों को बदला गया, जिससे स्वच्छता बनी रहे और संक्रमण का खतरा न्यूनतम हो सके।
“समय पर इलाज से बची जान”
डॉ. नेहा चव्हाण ने बताया कि यह बेहद नाजुक और रेयर केस था। यदि शिशु को समय पर अस्पताल नहीं लाया जाता, तो स्थिति जानलेवा हो सकती थी। सही समय पर एंटीबायोटिक थेरेपी शुरू होने और निरंतर देखभाल से ही शिशु को बचाया जा सका।
अस्पताल में पहली बार आया ऐसा मामला
सिविल सर्जन डॉ. रत्ना ठाकुर ने कहा कि इस प्रकार का मामला जिला अस्पताल में पहली बार सामने आया है। उन्होंने पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि डॉक्टरों के समर्पण और सही उपचार से एक नवजात को नया जीवन मिला है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों से अपील की कि किसी भी गंभीर बीमारी की स्थिति में तुरंत जिला अस्पताल का रुख करें।
अब पूरी तरह स्वस्थ है शिशु
करीब 25 दिनों के इलाज के बाद शिशु अब पूरी तरह स्वस्थ है और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। यह सफलता न केवल डॉक्टरों की मेहनत का परिणाम है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सही समय पर इलाज और समर्पित चिकित्सा से गंभीर से गंभीर बीमारी पर भी विजय पाई जा सकती है।





