Tuesday, February 24, 2026
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    कर्रेगुटा यानी ‘काला’ पहाड़ पर ऑपरेशन गरूड़: नक्सलियों के खिलाफ रणनीतिक हमला… तेज गर्मी से निपटते जवान पहाड़ी की घेराबंदी में डटे हैं

    रायपुर /बीजापुर, ।छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में कर्रेगुटा पहाड़ और कुरुट्टा-नदपल्ली इलाके में चल रहा ऑपरेशन गरूड़ नक्सलवाद के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा और सबसे सुनियोजित अभियान है। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, और तेलंगाना की संयुक्त सुरक्षा बलों ने 72 घंटों से अधिक समय तक हिड़मा, देवा, और 300 नक्सलियों को घेर रखा है। भीषण गर्मी में डीहाइड्रेशन के शिकार करीब तीन दर्जन जवानों को भद्राचलम हास्पिटल में भर्ती किया गया है। तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी जवान पहाड़ी को घेरकर डटे हुए हैं

     

    इस अभियान की रणनीति खुफिया जानकारी, उन्नत तकनीक, और समन्वित कार्रवाई पर आधारित है, जिसका लक्ष्य नक्सलियों के गढ़ को ध्वस्त करना और उनकी आपूर्ति लाइनों को नष्ट करना है।

     

    खुफिया जानकारी और तैयारी

     

    ऑपरेशन की नींव 3-4 दिन पहले मिले खुफिया इनपुट पर रखी गई, जिसमें कुरुट्टा-नदपल्ली और तेलंगाना के मुलुगु जिले में नक्सलियों की मौजूदगी की पुष्टि हुई थी। इसके आधार पर 5,000 जवानों की टीम तैयार की गई, जिसमें सीआरपीएफ, डीआरजी, एसटीएफ, कोबरा, तेलंगाना ग्रे हाउंड्स, और महाराष्ट्र सी-60 कमांडो शामिल थे। ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी की मदद से नक्सलियों के ठिकानों की सटीक मैपिंग की गई।

     

    घेराबंदी और नियंत्रण

     

    सुरक्षा बलों ने 7 किलोमीटर पैदल चलकर नक्सलियों को चारों ओर से घेर लिया, जिससे उनके भागने के रास्ते बंद हो गए। अपुष्ट सूचना के अनुसार करीब 10,000 जवानों की तैनाती इस पहाड़ को घेरने में की गई है। ‘कर्रेगुट्टा’ तेलगू शब्द है इसका मतलब है ‘काला पहाड़’। इस पहाड़ी की खासियत यह है कि यह लगभग 250 वर्ग किलोमीटर तक फैला हुआ है। जिसमें से करीब 50 किलोमीटर का इलाका छत्तीसगढ़ में आता है और शेष तेलंगाना से जुड़ा है। माना जा रहा है कि घने पेड़ों से उंचाई तक स्थित इस पहाड़ी को वर्ष 2018—19 में माओवादियों ने अपना सुरक्षित ठिकाना बनाना शुरू किया।

     

    यह इलाका एक प्रकार से माओवादियों के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना साबित होता रहा है। गुरिल्ला रणनीति से युद्ध लड़ने के लिए प्रशिक्षित माओवादियों की हथियार बंद सेंट्रल लीडरशिप इस इलाके में छिपी है इसके संकेत मिलने के बाद कर्रेगुटा पहाड़ को घेरने की खुफिया रणनीति पर काम किया गया। इस समय बस्तर में चलाए जा रहे एंटी नक्सल आपरेशन के रणनीतिकारों ने इस इलाके में सुरक्षा बलों की मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित की। कर्रेगुटा पहाड़ के घने जंगलों में नक्सलियों के गढ़ को निशाना बनाया गया, जहां अब 300 से ज्यादा नक्सली फंसे हुए हैं। पूरा पहाड़ सुरक्षाबलों के घेरे में है।

     

    Ascendantआपूर्ति लाइनों पर हमला

     

    ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य नक्सलियों की आपूर्ति लाइनों (भोजन, पानी, हथियार) को काटना है। सुरक्षा बलों का मानना है कि आपूर्ति बंद होने पर नक्सली कमजोर पड़ जाएंगे, क्योंकि उनके पास सुरंग या वैकल्पिक रास्ते नहीं हैं। जवानों ने नक्सलियों के रसद ठिकानों को नष्ट करने और संचार नेटवर्क को बाधित करने पर ध्यान केंद्रित किया है।

     

    उन्नत तकनीक और समन्वय

     

    ड्रोन, सैटेलाइट, और हेलिकॉप्टरों का उपयोग निगरानी, रसद आपूर्ति, और घायल जवानों को निकालने के लिए किया जा रहा है, हालांकि घने जंगलों में ड्रोन की प्रभावशीलता सीमित है। तीन राज्यों के बलों के बीच रियल-टाइम समन्वय ने नक्सलियों की सीमा पार आवाजाही को रोका है। 100 से अधिक आईईडी को विशेष बम निरोधक दस्तों ने निष्क्रिय किया है।

     

    लक्षित सर्च और कार्रवाई

     

    बांकेर जैसे 12 शीर्ष नक्सलियों को पकड़ने के लिए 160 जवानों की विशेष टीमें तैनात की गई हैं। हिड़मा और देवा, जो मुठभेड़ स्थल से 30 किलोमीटर दूर हैं, इस ऑपरेशन के प्रमुख लक्ष्य हैं। रात में नक्सली गतिविधियों को रोकने के लिए नाइट विजन डिवाइस और कमांडो यूनिट्स का उपयोग हो रहा है।

     

    निरंतर दबाव

     

    ऑपरेशन को लंबे समय तक (72 घंटे से अधिक) चलाकर नक्सलियों को थकाने और उनकी लड़ने की क्षमता को कम करने की रणनीति अपनाई गई है। जवानों को हेलिकॉप्टरों से नियमित रसद और पानी की आपूर्ति की जा रही है।

     

    ऑपरेशन की प्रगति को वीडियो और तस्वीरों के जरिए प्रलेखित किया जा रहा है, ताकि इसकी सफलता को जनता तक पहुंचाया जा सके। स्थानीय समुदायों को नक्सलियों के खिलाफ एकजुट करने और आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।

     

    चुनौतियां और समाधान

     

    घना जंगल: कम दृश्यता के कारण ड्रोन की सीमित उपयोगिता को देखते हुए पैदल सर्च और विशेष कमांडो यूनिट्स पर जोर दिया गया है।

    आईईडी और किलेबंद ठिकाने: विशेष बम निरोधक दस्ते और स्निफर डॉग्स की तैनाती से नक्सलियों के विस्फोटकों और छिपे ठिकानों का मुकाबला किया जा रहा है।

    जवानों का स्वास्थ्य: लू और थकान से प्रभावित जवानों के लिए तत्काल चिकित्सा सुविधाएं और हेलिकॉप्टर निकासी की व्यवस्था की गई है।

     

    ऑपरेशन गरूड़ नक्सलवाद के खिलाफ एक ऐतिहासिक अभियान है, जो खुफिया जानकारी, तकनीकी संसाधनों, और बलों के समन्वय पर आधारित है। बड़े पैमाने पर घेराबंदी, सघन सर्च, और आपूर्ति लाइनों पर हमले इस ऑपरेशन को निर्णायक बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। यदि यह रणनीति सफल रही, तो नक्सलियों का यह मजबूत गढ़ ध्वस्त हो सकता है, जिससे छत्तीसगढ़ और देश में नक्सलवाद पर लगाम लगाने में महत्वपूर्ण सफलता मिलेगी।

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