Monday, February 23, 2026
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    कुर्सी की आस में अपनों ने ही बिगाड़ा भाजपा-कांग्रेस का समीकरण

     

     

    दोनों पार्टियों के असंतुष्ट नेताओं ने दिया इस्तीफ़ा, चुनाव मैदान में बन गए प्रतिद्वंद्वी

     

    डोंगरगांव ।स्थानीय निकाय चुनावों में राजनीतिक समीकरण हर दिन नया मोड़ ले रहे हैं। सत्ता की चाहत और टिकट बंटवारे से उपजे असंतोष ने भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दलों के गणित को गड़बड़ा दिया है। इसका ताज़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब कांग्रेस से पूर्व नगर पंचायत उपाध्यक्ष ललित लोढ़ा की पत्नी पिंकी लोढ़ा और भाजपा से नेत्री सरिता ढीमर ने बागी तेवर दिखाते हुए चुनावी मैदान में एंट्री ले ली।

     

    *राजनीतिक असंतोष बना नया समीकरण*

     

    टिकट वितरण से असंतुष्ट नेताओं ने अपने-अपने दलों से इस्तीफ़ा देकर निर्दलीय रूप से नामांकन भर दिया है। यह कदम न सिर्फ दोनों पार्टियों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित होगा, बल्कि चुनावी परिणामों पर भी बड़ा असर डाल सकता है।

     

    कांग्रेस से असंतुष्ट ललित लोढ़ा की पत्नी पिंकी लोढ़ा ने निर्दलीय नामांकन भरा है। दूसरी ओर, भाजपा की सरिता ढीमर ने भी टिकट न मिलने से नाराज़ होकर अलग राह पकड़ ली है। अब ये दोनों प्रत्याशी अपनी-अपनी पार्टियों के आधिकारिक उम्मीदवारों के मुकाबले सीधी चुनौती पेश कर रही हैं।

     

    *भाजपा-कांग्रेस की रणनीति पर असर*

     

    भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए यह स्थिति मुश्किलें बढ़ा सकती है। पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के वोट बैंक में सेंध लगने की पूरी संभावना है, क्योंकि ये असंतुष्ट नेता पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच अपनी पैठ रखते हैं। अगर असंतोष गहराया, तो चुनावी गणित पूरी तरह से उलट सकता है।

     

    *चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है प्रभाव*

     

    1. वोटों का विभाजन: बागी उम्मीदवारों की मौजूदगी से वोटों का बंटवारा होगा, जिससे आधिकारिक प्रत्याशियों की जीत का अंतर प्रभावित हो सकता है।

     

     

    2. स्थानीय समीकरणों में बदलाव: निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरने वाले नेता यदि मजबूत जनाधार रखते हैं, तो वह किसी भी पार्टी की जीत-हार तय कर सकते हैं।

     

     

    3. भविष्य की राजनीति पर असर: चुनाव बाद अगर निर्दलीय प्रत्याशी जीतते हैं या अच्छे मत हासिल करते हैं, तो वे भविष्य में स्थानीय राजनीति में एक नया ध्रुव बना सकते हैं।

     

     

     

    *क्या होगा आगे?*

     

    अब देखना यह है कि भाजपा और कांग्रेस इस स्थिति से कैसे निपटते हैं। क्या वे अपने बागी नेताओं को मनाने की कोशिश करेंगे, या फिर मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा? चुनाव नतीजे यह भी तय करेंगे कि असंतोष का यह उबाल सिर्फ तात्कालिक है या फिर भविष्य में भी पार्टियों के लिए सिरदर्द बना रहेगा।

     

    *ये हो सकता है नतीजा*

    स्थानीय निकाय चुनावों में यह पहली बार नहीं हो रहा कि टिकट न मिलने पर नेता बगावत कर रहे हैं, लेकिन जब पार्टी के अंदरूनी असंतोष से सीधे विपक्षी दल को फायदा पहुंचे, तो यह बड़ा संकेत है। यह सिर्फ चुनावी गणित ही नहीं, बल्कि पार्टियों की आंतरिक राजनीति और रणनीति पर भी सवाल खड़े करता है।

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