छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की सख्ती, थानों के सीसीटीवी कैमरों और फुटेज संरक्षण पर दिए निर्देश

बिलासपुर(कमलकांत पाटनवार):- छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पुलिस थानों में लगे सीसीटीवी कैमरों के संचालन, निगरानी और फुटेज के संरक्षण को लेकर राज्य सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश और कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत पुलिस थानों में सीसीटीवी व्यवस्था केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और लोगों के अधिकारों की सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है। कैमरे हर समय चालू रहें, पर्याप्त पावर बैकअप और स्टोरेज क्षमता हो तथा निर्धारित अवधि तक फुटेज सुरक्षित रहे, यह सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। हालांकि, गौरेला थाने में सितंबर 2024 के दौरान आरोपितों की कथित हिरासत से संबंधित सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं होने के कारण हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि फुटेज 18 माह बाद स्वत: डिलीट हो चुका है और अब उसकी उपलब्धता नहीं है। वहीं, आरोपितों के मोबाइल नंबरों का सीडीआर ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड पर मौजूद होने के कारण उन्हें बचाव में इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता दी गई है।

एनडीपीएस मामले में मांगा था सीसीटीवी फुटेज

मामला गौरेला थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 304/2024 से जुड़ा है। अनूपपुर (मध्य प्रदेश) के बनवारी लाल गुप्ता, रोहित गुप्ता, अंकुल जैतवार और गोपाल पनाडिया उर्फ गोपी पनिका के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 20(बी), 29 और भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 के तहत मामला दर्ज है। प्रकरण की सुनवाई बिलासपुर के विशेष न्यायाधीश (एनडीपीएस एक्ट) की अदालत में चल रही है। आरोपितों ने दावा किया था कि उन्हें 14 सितंबर 2024 को कथित घटना से एक दिन पहले गौरेला थाने में रखा गया था। उनका कहना था कि थाने के बाहर और मुख्य प्रवेश द्वार पर लगे कैमरों में उनकी मौजूदगी दर्ज हुई होगी। इसी आधार पर उन्होंने सीआरपीसी के स्थान पर लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 94 के तहत 13 से 15 सितंबर 2024 तक का सीसीटीवी फुटेज और 14 सितंबर का मोबाइल लोकेशन डाटा मांगा था।

18 महीने की अवधि में ही डिलीट हो गया फुटेज

ट्रायल कोर्ट ने पुलिस से रिपोर्ट मांगी। पुलिस ने बताया कि संबंधित अवधि का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं है। राज्य की ओर से हाई कोर्ट में बताया गया कि 26 दिसंबर 2022 के निर्देश के अनुसार सीसीटीवी फुटेज को 18 महीने तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था है। आरोपितों ने फुटेज के लिए आवेदन 23 मई 2025 को दिया, जबकि ट्रायल कोर्ट ने पुलिस से रिपोर्ट 5 मई 2026 को मांगी। इस अवधि तक फुटेज स्वत: डिलीट हो चुका था। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि ट्रायल कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र की कोई गलती की है। इसलिए सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने संबंधी आवेदन खारिज करने के आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं है।

सीडीआर रिकॉर्ड पर, बचाव में कर सकते हैं इस्तेमाल

कोर्ट ने हालांकि मोबाइल के सीडीआर और टावर लोकेशन के मामले में स्थिति अलग पाई। पुलिस की रिपोर्ट में बताया गया कि आरोपितों के मोबाइल नंबरों का सीडीआर प्राप्त किया गया था और बाद में उसे ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश कर रिकॉर्ड पर लिया जा चुका है। कोर्ट ने कहा कि आरोपित इन सीडीआर का अपने बचाव में इस्तेमाल कर सकते हैं और कानून के अनुसार इसकी जांच, प्रमाण और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में विचार की मांग कर सकते हैं। सीडीआर की प्रासंगिकता और साक्ष्यात्मक महत्व का निर्धारण ट्रायल कोर्ट करेगा।

मुख्य सचिव ने बताया- 550 थानों के लिए 102 करोड़ की योजना

मामले में हाई कोर्ट के निर्देश पर मुख्य सचिव ने व्यक्तिगत शपथपत्र पेश किया। इसमें बताया गया कि राज्य में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप स्टेट लेवल ओवरसाइट कमेटी (एसएलओसी), डिस्ट्रिक्ट लेवल ओवरसाइट कमेटी (डीएलओसी) और अन्य निगरानी व्यवस्था गठित है। मुख्य सचिव ने 20 अगस्त 2026 को सभी एसएलओसी और डीएलओसी को सख्त अनुपालन निर्देश जारी किए हैं। सभी डीएलओसी को हर महीने अनिवार्य निरीक्षण बैठक करने, थानों में 18 माह तक फुटेज सुरक्षित रहने की व्यवस्था की भौतिक जांच करने, पावर बैकअप सुनिश्चित करने और प्रत्येक माह की पांच तारीख तक एसएलओसी को अनुपालन रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं।

इसके अलावा राज्य सरकार ने पुलिस आधुनिकीकरण योजना के तहत 550 पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों और पूरी आधारभूत संरचना के उन्नयन के लिए करीब 102.10 करोड़ रुपये की परियोजना प्रस्तावित की है। इसमें 31 जिला डैशबोर्ड और पुलिस मुख्यालय में एक राज्य स्तरीय केंद्रीकृत डैशबोर्ड भी शामिल है।

भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नष्ट न हो

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार और परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह सहित सीसीटीवी से संबंधित निर्देश बाध्यकारी हैं। इनका उद्देश्य पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना तथा आपराधिक न्याय प्रणाली के संपर्क में आने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि सभी पुलिस थानों के सीसीटीवी हमेशा कार्यशील रहें, नियमित निरीक्षण हो, पर्याप्त बिजली बैकअप और स्टोरेज क्षमता उपलब्ध हो तथा कानून के अनुसार फुटेज सुरक्षित रखा जाए। जहां भी लापरवाही सामने आए, वहां जिम्मेदारी तय की जाए। इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने चारों आरोपितों की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने उनके खिलाफ चल रहे अभियोजन या कथित हिरासत के बचाव के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है और ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करेगा।

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