छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की कई इमारतें स्वतंत्रता संग्राम की इतिहास को समेट कर रखे हुए हैं। इन इमारतों पर कभी अंग्रेजों के कामकाज और रहने का ठिकाना हुआ करता था। इनमें से एक मुख्य धरोहर जो अभी भी शान से खड़ा है, वो है रायपुर के जयस्तंभ चैक में स्थित रविभवन का केसर-ए-हिंद दरवाजा। यह दरवाजा आज भी उन चुनिंदा जगहों में से एक है जो रायपुर में अंग्रेजों मौजूदगी की गवाही देते हैं।
राजधानी रायपुर के जयस्तंभ चैक में मालवीय रोड की तरफ खड़े होने से केसर-ए-हिंद दरवाजा आसानी से दिखाई देता है। नाम के अनुसार यह कोई बड़ा दरवाजा प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। यह एक गेरूआ रंग वाला विशालकाय प्रवेश द्वार है। वर्तमान में यह रवि भवन से लगा हुआ है। जब किसी समय, रायपुर नगर निगम की दुकानों को तोड़कर रवि भवन नाम का एक विशाल कॉमर्शियल काॅम्पलेक्स बनाया गया तो इस दरवाजा को संरक्षित रखने का प्रयास किया गया। हालांकि एक योजना के मुताबिक इस दरवाजे को तोड़ने का ही प्लान बन गया था। लेकिन इसे बचाने के लिए तत्कालीन समय में राज्य के बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों ने अपनी पुरजोर कोशिश की थी। जनवरी 1877 में निर्मित 12 मीटर इस दरवाजे को फतेहपुर सीकरी से प्रेरणा लेकर तत्कालीन तहसीलदार इरशाद अली ने बनवाया था। कारीगर का नाम राम सिंह गौर था। इस द्वार को बनाने के लिए दान मांगे गए। दानदाताओं में जैतूसाव 2000 रू., कन्हैयालाल 1000 रूपए, फेहरसिंह 500 रूपए, पीलासाव 500 रूपए, बद्रीनाथ 500 रूपए, किशन राव 500 रूपए, सिरपतराव 400 रूपए, इस प्रकार 5400 रूपए का दान दिए। इन दान दाताओं के नाम उस दरवाजे पर आज भी बारीक अक्षरों में उकेरे देखे जा सकते हैं। आप केसर-ए-हिंद दरवाजे को ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि मीनार और गुबंद मुस्लिम शैली में बनाई गई है। खास बात यह है कि हिन्दू मतदाताओं से प्राप्त राशि से मुस्लिम शैली में ईसाई महारानी के लिए यह दरवाजा निर्मित हुआ है। इस प्रकार देखा जाए तो इस दरवाजे के इतिहास में तीन धर्मों का समन्वय दिखाई देता है। जिस समय यह दरवाजा बना उस समय आज के जैसे सीमेंट या गारे की जुड़ाई नहीं होती थी। दरवाजा लंबे समय तक सुरक्षित रहे इसलिए इसमें एक फुट मोटा और डेढ़ फुट लंबे पत्थरों को उड़द दाल और सरेस से मजबूती से जोड़ा गया है।





