पुरानी चीनी कथा है। एक बूढ़ा आदमी अपने जवान बेटे के साथ कुएं से पानी खींच रहा है। दोनों बैल की तरह जुते हैं और पानी खींच रहे हैं।
शहर से आया हुआ एक आदमी, जो #कनफ्यूशियस का शिष्य है, वह इन दोनों को इस भरी दोपहरी में, पसीने से लथपथ, और यह बूढ़ा होगा कोई सत्तर साल से भी ज्यादा उम्र का और इसका जवान बेटा और ये दोनों बैलों की तरह जुते हैं। उसने बूढ़े से कहा कि लगता है तुम्हें पता नहीं कि अब पानी खींचने के नये आविष्कार हो गए हैं!
बूढ़े ने कहा, चुप! बिलकुल चुप! पहले मेरे बेटे को चले जाने दो। अभी यह घर जाएगा रोटी लेने, फिर तुमसे बात करूंगा।
बेटा रोटी लेने गया, वह कनफ्यूशियस का अनुयायी बोला कि तुमने मुझे चुप क्यों किया?
उसने कहा, मेरे बेटे के कारण, क्योंकि वह सुन ले तो उसकी जिंदगी नष्ट हो जाए। मुझे पता है कि पानी खींचने के नये यंत्र आविष्कृत हो गए हैं। अब हमें बैलों की तरह जुतने की जरूरत नहीं है।
तो उस कनफ्यूशियस के मानने वाले ने कहा कि फिर तुम कैसे पागल हो! फिर क्यों मेहनत कर रहे हो? कितना समय नहीं बच जाएगा!
उस बूढ़े ने कहा, वह तो मुझे भी मालूम है, समय बच जाएगा। लेकिन मैं यह पूछता हूं, फिर मैं उस समय का क्या करूंगा? लडूंगा, झगडूंगा, जुआ खेलूंगा, शराब पीऊंगा–फिर मैं उस समय का क्या करूंगा?
पहले तुम इसका उत्तर लाओ कि समय बच जाएगा तो मैं उस समय का क्या करूंगा? अपने गुरु कनफ्यूशियस से पूछो कि समय का क्या करूंगा, फिर तुम आना।
जब वह व्यक्ति कनफ्यूशियस के पास पहुंचा तो कनफ्यूशियस ने कहा, तुम्हें उस बूढ़े को परेशान करने की जरूरत नहीं। वह बहुत बुद्धिमान है। उसने ठीक कहा। आदमी समय बचा लेगा तो फिर करेगा क्या? फिर उपद्रव करेगा।
इस सदी के मनुष्य ने कुछ चीजें गंवा दी हैं, उनमें एक प्रतीक्षा भी है। विनम्रता गंवा दी है, कारण मिल गया विज्ञान में। विज्ञान ने आदमी को अहंकार दे दिया कि मैं क्या नहीं कर सकता! सब कर लूंगा–तूफानों को जीत लूंगा, बादलों को जीत लूंगा, मरुस्थलों को बगीचे बनाऊंगा, आकाश में बस्तियां तैराऊंगा–क्या नहीं कर सकता हूं!
विज्ञान ने मनुष्य को अहंकार दे दिया। और विज्ञान ने ही मनुष्य के हाथ से प्रतीक्षा भी छीन ली। क्योंकि विज्ञान ने कहा: जल्दी करो! जल्दी हो सकता है! जहां तुम तीन दिन में पहुंचते हो वहां हम तुम्हें तीन मिनट में पहुंचा सकते हैं।
तो विज्ञान ने एक त्वरा सिखा दी, एक जल्दी सिखा दी। अब हर आदमी भागा जा रहा है। जो ट्रेन से सफर करता, वह हवाई जहाज से सफर कर रहा है। जो बैलगाड़ी से सफर करता, वह ट्रेन से सफर कर रहा है। तेजी है।
लेकिन कोई पूछे कि समय बचा कर करोगे क्या? तो बड़ी हैरानी होती है। ट्रेन से न जाकर हवाई जहाज से गए, तीन दिन बच गए, अब क्या करना?
अब ताश खेलो, शतरंज बिछाओ, सिनेमा देखो, रेडियो, टेलीविजन। या बैठ कर लोगों से बकवास करो। और कोई पूछे कि क्या कर रहे हो? तो तुम कहते हो, समय काट रहे हैं। पहले समय बचाते हो, फिर समय काटते हो, खूब बुद्धिमान हो!
इसलिए तुम्हें गरीब आदमी भला मालूम होता है, क्योंकि उसके पास समय नहीं है उपद्रव करने को। गरीब आदमी में और कुछ खूबी नहीं है। गरीबी में जो अध्यात्म मालूम होता है वह गरीबी में नहीं है; उसका असली कारण केवल इतना है, उसके पास उपद्रव का समय नहीं है। रोटी-रोजी कमाए कि लड़े-झगड़े? बच्चे पाले कि जुआ खेले?
किसी तरह छप्पर बचाए, कपड़े लाए कि शराब पीए? समय उसके पास है नहीं। उसके पास सपने तक देखने का समय नहीं है। रात जब सोता है तो घोड़े बेच कर सोता है। अमीर जब रात सोता है तो सो भी नहीं सकता। उसके पास इतना समय है कि वह दिन भर भी आराम करता रहा, अब रात नींद कैसे आए?
विज्ञान ने अहंकार दे दिया। ज्ञान सदा अहंकार देता है। और ज्ञान ने सुविधाएं दे दीं कि काम जल्दी से हो सकते हैं। मैं विज्ञान का विरोधी नहीं हूं, खयाल रखना। और न ही मैं इस बात का विरोधी हूं कि मशीनें समाप्त कर दी जाएं।
लेकिन अगर मनुष्य में समझ हो…अगर मैं उस बूढ़े आदमी से मिला होता तो उससे कहता कि जब समय बचे तो ध्यान करना। कोई शतरंज खेलने की मजबूरी थोड़े ही है। कोई जुआ खेलने की जबरदस्ती थोड़े ही है। समय बचे तो ध्यान करना। समय बचे तो प्रार्थना में डूबना। समय बचे तो नाचना–परमात्मा की कृतज्ञता और धन्यवाद में।
लेकिन कनफ्यूशियस की दृष्टि में परमात्मा और प्रार्थना का कोई स्थान नहीं था। इसलिए कनफ्यूशियस उस बूढ़े की बात का जवाब नहीं दे सका।
मैं गरीबी के पक्ष में नहीं हूं, क्योंकि गरीबी के कारण जो आदमी में सरलता दिखाई पड़ती है वह थोथी है। मैं तो अमीरी का पक्षपाती हूं। मैं चाहता हूं अमीर हो जाओ जितने हो सकते हो।
लेकिन अमीर होने से कोई मतलब यह नहीं है कि तुम्हें शराब ही पीनी पड़ेगी। अरे और भी शराबें हैं! परमात्मा की शराब है। समय होगा तो उसे पीना। समय तो होना चाहिए, लेकिन ठीक दिशा में नियोजित करने के लिए अगर समझ हो तो कोई हर्जा नहीं।
विज्ञान ने अहंकार दे दिया और विज्ञान ने तुमसे प्रतीक्षा छीन ली। तुम धैर्य रखना ही भूल गए। तुम्हें स्मरण ही नहीं रहा कि धैर्य का भी एक आनंद है, कि बैठे चुपचाप समय को गुजर जाने देने का भी एक मजा है।





