संडे फीचर – गजेंद्र कुमार साहू, युवा साहित्यकार, रायपुर
थोड़ा है, थोड़े की, ज़रूरत है, ज़िंदगी फिर भी यहाँ खूबसूरत है : अब केवल कल्पना है।
यह गाना सुनने में जितना अच्छा है, अपनाने में उतना ही कठिन। यह कहावत केवल 20वी सदी तक ही सटीक बैठती है। इस 21वी सदी में इसका कोई औचित्य नहीं है। क्या वाक़ई मनुष्य अब ज़िंदगी को थोड़े में खूबसूरत देखना चाहता है, नहीं बिलकुल नहीं। अब थोड़े में काम नहीं चलने वाला। अब लालच, आगे बढ़ने की हवस, दूसरों से ईर्ष्या, सहेजने की प्रकृति, पैसे की चाह अपने चरम पर है।
अब रिश्ते नाम के नहीं काम के रह गए है। पहले व्यक्ति जीवन जीता था अब व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ना चाहता है। अब एक-दूसरे को याद करना और बात भी कर लेना एक प्रकार से स्वार्थ निहित ही है। अब व्यक्ति संतुष्ट और खूबसूरत जीवन नहीं, व्यक्ति असंतुष्ट और दिखावा भरा जीवन जीना चाहता है। संतुष्टि को इंसानों ने मार दिया और अब असंतुष्टि इंसान को धीरे-धीरे मार देगी।
समाज का बटवारा अब जाति आधार पर नहीं पैसे के आधार पर होने लगा है। अमीर-ग़रीब। लोग अपने आपको सभी से बेहतर दिखाने में लगे हुए है। हैसियत के ऊपर की चीजों को लेकर अन्य से ऊपर होने के वहम में क़र्ज़ और तनाव से धीरे-धीरे दबता जा रहा है। सोशल मीडिया ने इस दहकाती आग में घी नहीं पेट्रोल का काम किया है। मैं, आप और अब की पीढ़ी इस दहकाती आग में कूद चुके है इसमें कोई दो राय नहीं है। हमने ज़रूरत के सामानों को स्टेटस का सिम्बॉल बनाकर अपनी परेशानी और विनाशकारी भविष्य को ख़ुद आमंत्रित कर दिया है।
डॉक्टर, इंजीनियर, सरकारी नौकरी, जनप्रतिनिधि जैसे पद पहले सेवा कार्य के कारण पूजनीय थे इसलिए लोग इनसे क़रीब थे। अब इनमे आर्थिक भाव, सामाजिक ऊँची नाक और स्टेटस ने प्रवेश कर लिया है। इसलिए आम जनमानस इनसे दूर होते जा रहे हैं और दोनों के बीच गहरी खाई नज़र आने लगी है।
इस दहकाती आग को जितना जल्दी शांत कर सके तो किया जाना चाहिए। नहीं तो इस आग में इंसानियत, रिश्ते, विश्वास और ईमानदारी जलकर ख़ाक हो जाएगी।





