प्रार्थना शेड बना कबाड़खाना: बारिश में भीगकर तो कभी तेज धूप में राष्ट्रगान गाने को मजबूर मासूम बच्चे

  • घटिया साइकिलों से बच्चों की जान को खतरा

  • अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की बेरुखी से भड़के ग्रामीण

धरसींवा(विद्याभूषण वर्मा)। छत्तीसगढ़ के धरसींवा ब्लॉक में शिक्षा विभाग की लापरवाही और बेलगाम प्रशासनिक संवेदनहीनता का एक ऐसा शर्मनाक नज़ारा देखने को मिल रहा है, जिसने सरकारी तंत्र की साख पर गहरा बट्टा लगा दिया है। बेटियों को सशक्त बनाने के नाम पर चलाई जा रही सरस्वती साइकिल योजना अब स्थानीय अफसरों और ठेकेदारों की अंधी कमीशनखोरी तथा बेरुखी का अखाड़ा बन चुकी है। दाऊ पोषण लाल शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परसतराई का पूरा प्रांगण और जिस शेड के नीचे बच्चे सिर छिपाकर प्रार्थना करते थे, उसे विभाग ने रातों-रात एक अवैध कबाड़खाने और रिपेयरिंग सेंटर में तब्दील कर दिया है।

भीषण बरसात के इस मौसम में जहां हर कोई छत तलाशता है, वहीं ब्लाक मुख्यालय धरसींवा से लगे दाऊ पोषण लाल शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परसतराई स्कूल के सैकड़ों मासूम बच्चे रोज़ाना मुसलाधार बारिश में भीगते हुए खुले आसमान के नीचे प्रार्थना और राष्ट्रगान करने पर मजबूर हैं। वजह सिर्फ इतनी है कि शिक्षा विभाग ने छात्राओं के लिए आईं लगभग 1300 साइकिलों के कलपुर्जे उसी प्रार्थना शेड के नीचे लाकर पटक दिए हैं। विगत एक माह से स्कूल परिसर में चारों ओर जंग लगे लोहे के नुकीले फ्रेम, टेढ़े-मेढ़े रिम, ग्रीस से सने डिब्बे और ढीले नट-बोल्ट बिखरे पड़े हैं। खेल-कूद का मैदान तो छीन ही लिया गया है, साथ ही इन बिखरे नुकीले कलपुर्जों के बीच हर पल बच्चों के ज़ख्मी होने का ख़तरा मंडरा रहा है।


  • घटिया फिटिंग से बेटियों की जान जोखिम में

सबसे बड़ा घोटाला और लापरवाही साइकिलों की असेंबलिंग के नाम पर हो रही है। छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग ने हज़ारों साइकिलों को जोड़ने और तैयार करने का मोटा ठेका उत्तर प्रदेश के किसी रसूखदार ठेकेदार को दे दिया है। ठेकेदार खुद तो अपनी जेबें भरकर गायब हो चुका है और इस संवेदनशील काम को कुछ बेबस, अप्रशिक्षित दिहाड़ी मज़दूरों के भरोसे छोड़ गया है। खुले आसमान के नीचे बिना किसी तकनीकी जांच और मानकों के, आधी-अधूरी और डगमगाती साइकिलें तैयार की जा रही हैं। नए पहियों के रिम पहले से ही टेढ़े हैं, ब्रेक और चेन कवर हाथ लगाते ही हिल रहे हैं, और हैंडल की फिटिंग इतनी कमज़ोर है कि सफर के दौरान वे कभी भी निकल सकते हैं। इन्हीं जानलेवा और खस्ताहाल साइकिलों को बिना किसी गुणवत्ता जांच के सीधे बेटियों की झोली में डालने की पूरी तैयारी कर ली गई है।


  •  अफसरों की बेपरवाही और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी: भगवान भरोसे बेटियों की सुरक्षा ,,

हैरानी और अफसोस की बात यह है कि ब्लॉक शिक्षा अधिकारी से लेकर विभाग के तमाम आला अफसरों को इस बात की तनिक भी फुर्सत नहीं है कि वे मौके पर जाकर देखें कि स्कूल किस हाल में है और बच्चे किस तकलीफ से गुज़र रहे हैं। अधिकारी एसी कमरों में बैठकर कागज़ी खानापूर्ति में मस्त हैं, जबकि ज़मीनी हकीकत में बेटियों की सुरक्षा को ताक पर रख दिया गया है। इस पूरे तमाशे पर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने भी अपने मुंह और कान बंद कर लिए हैं। चुनाव के समय बड़े-बड़े दावे करने वाले नेता आज इन नौनिहालों और बेटियों की सुध लेने की ज़रा सी भी ज़हमत नहीं उठा रहे हैं।


  • अफसरशाही की जलवा: जनता के लिए खाली कुर्सी और बंद फोन

सरस्वती साइकिल योजना में खुलकर हो रही धांधली पर जब पीड़ित छात्र और परेशान पालक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी से शिकायत करना चाहते हैं, तो साहब के पास उनका फोन उठाने तक की फुर्सत नहीं होती। दफ्तर का चक्कर काटकर थक चुके ग्रामीणों को हर बार केवल खाली कुर्सी ही मिलती है, साहब अक्सर अपने कमरों से नदारद रहते हैं। हैरानी की बात यह है कि आम जनता और बेटियों की समस्याओं पर ‘लापता’ रहने वाले यही आला अफसर किसी नेताजी का फोन आते ही जी-हुजूरी में तुरंत हाजिर हो जाते हैं। नेताओं के आगे नतमस्तक और आम जनता के लिए बेपरवाह इन अफसरों की इस दोहरी नीति ने प्रशासन की पोल खोलकर रख दी है।

 

 

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