महिला समूह से 8.85 लाख का गबन: शिकायत के बाद नागपुर से गिरफ्तारी

  • डोंगरगांव पुलिस की कार्रवाई; लोन के पैसों से खरीदे टीवी-फ्रिज, शेयर मार्केट में भी लगाया पैसा

डोंगरगांव(दीपक अवस्थी)। ग्राम करेठी के प्रज्ञा महिला स्व-सहायता समूह से 8 लाख 85 हजार रुपए के गबन के मामले में डोंगरगांव पुलिस ने समूह की अध्यक्ष को महाराष्ट्र के नागपुर से गिरफ्तार किया है। आरोप है कि अध्यक्ष ने समूह की अन्य सदस्यों को बिना जानकारी दिए बैंक से लोन उठाकर पूरी रकम निजी उपयोग में खर्च कर दी।

पुलिस के अनुसार ग्राम करेठी निवासी गणेशिया बाई बघेल (60) प्रज्ञा महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष थी। आरोप है कि उसने 9 जनवरी 2024 को समूह के नाम पर 8 लाख 85 हजार रुपए का लोन लिया, लेकिन यह राशि समूह के खाते में जमा नहीं की गई और न ही सदस्यों को इसकी जानकारी दी गई। बाद में इस रकम का उपयोग निजी खर्चों में कर लिया गया।

इस मामले में समूह की सदस्य पेमिन साहू ने 2 जनवरी 2026 को डोंगरगांव थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में बताया गया था कि अध्यक्ष ने समूह के नाम पर लोन लेकर रकम का हिसाब नहीं दिया और सदस्यों को इसकी जानकारी भी नहीं दी।

पुलिस जांच के दौरान पता चला कि आरोपी महिला महाराष्ट्र के नागपुर के कलमना क्षेत्र में छिपी हुई है। इसके बाद थाना प्रभारी के निर्देशन में पुलिस टीम नागपुर रवाना हुई और घेराबंदी कर आरोपी को गिरफ्तार कर डोंगरगांव लाया गया।

पूछताछ में आरोपी ने पुलिस को बताया कि उसने लोन की रकम से घर की मरम्मत कराई, टीवी, फ्रिज और कूलर खरीदे, वहीं कुछ राशि शेयर मार्केट में निवेश कर दी।

इस कार्रवाई में प्रशिक्षु आईपीएस आदित्य कुमार, निरीक्षक आशीर्वाद राहटगांवकर, एएसआई देवकुमार रावटे सहित पुलिस टीम शामिल रही।

पहले भी उठ चुका है मामला

इस मामले में एजी ख़बर ने 23 मई 2025 को भी महिला समूह की सदस्यों की शिकायत संबंधी खबर प्रकाशित की थी। उस समय आरोप लगाया गया था कि अध्यक्ष ने बैंक से दो बार लोन लेकर और खाते से रकम निकालकर 8.85 लाख , ब्याज सहित लगभग 11 लाख रुपए  का गबन किया है।


                        विशेषज्ञ की राय


कानूनी विशेषज्ञ हाईकोर्ट एडवोकेट अभय तिवारी के अनुसार, यदि महिला समूह की सदस्यों ने लोन से संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए होंगे तो उन्हें भी न्यायालय में बतौर पक्ष बनाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि पुलिस के समक्ष दिए गए कथित स्वीकारोक्ति बयान को अक्सर आरोपी अदालत में स्वीकार नहीं करता। ऐसे में न्यायालय दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद ही यह तय करेगा कि जिम्मेदारी किसकी है और समूह की सदस्यों को किस प्रकार राहत मिल सकती है।

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