रितेश मिश्रा की कलम से इंद्रावती – लाइफ लाइन ऑफ़ बस्तर की गजब कहानी

इंद्रावती नदी का एक हिस्सा कुछ स्थानों पर गुप्त रूप से बहता है, यानी यह ज़मीन के नीचे चली जाती है और फिर आगे जाकर पुनः सतह पर प्रकट होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह भू-गर्भीय संरचना और चूना पत्थर की गुफाओं के कारण होता है।

इंद्रावती नदी पर बना चित्रकूट जलप्रपात भारत का एकमात्र ऐसा जलप्रपात है, जो बारिश के मौसम में 300 मीटर चौड़ा हो सकता है! इसकी विशालता इसे भारत के नियाग्रा जलप्रपात जैसा बनाती है।

इस नदी के आसपास दुर्लभ प्रजातियों के वन्यजीव पाए जाते हैं, जैसे कि जंगली भैंसा (Indian Bison), तेंदुआ, और उड़ने वाली गिलहरी।

यहाँ पर मगरमच्छों की भी एक अनोखी प्रजाति पाई जाती है, जिसे “नरियल मगर” (Marsh Crocodile) कहा जाता है।

इंद्रावती नदी के कुछ क्षेत्रों में पाई जाने वाली रेत में सूक्ष्म मात्रा में सोने के कण पाए जाते हैं। आदिवासी समुदाय पारंपरिक तरीकों से इस बालू से सोना निकालने का कार्य करते थे

ऐसा कहा जाता है कि इंद्रावती नदी के तट पर कई डूबे हुए मंदिर भी हैं, जो समय के साथ जल स्तर बढ़ने के कारण अदृश्य हो गए।

 

बस्तर के स्थानीय आदिवासी समुदायों के अनुसार, इंद्रावती नदी एक अप्सरा थी, जिसने इस भूमि को छोड़ने का निश्चय किया और बहती हुई चली गई। यही कारण है कि इसे पवित्र माना जाता है।

कुछ जनजातियाँ मानती हैं कि इंद्रावती नदी के पानी में औषधीय गुण हैं और इसका उपयोग त्वचा रोगों के उपचार के लिए किया जाता है।

ये भी कहा जाता है कि इंद्रावती नदी के किनारे बसे आदिवासी गोटुल संस्कृति में पारंपरिक नृत्य करते हैं, जिसका तालमेल नदी के बहाव से जुड़ा होता है। उनके नृत्य की लय और नदी की धारा में एक गहरा संबंध माना जाता है।

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