अस्पताल का बिस्तर। जेब एकदम खाली। शरीर कैंसर से लड़ रहा था।
डॉक्टरों ने पूछा, “इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, तो भर्ती क्यों हुए? तुम हो कौन?”
वह बूढ़ा व्यक्ति चुप रहा। बस आंखों से आंसू बह निकले।
तभी एक पत्रकार ने पहचाना। यह कोई भिखारी नहीं था। यह वह शख्स था जिसने भगत सिंह के साथ असेंबली में बम फेंका था।
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं ‘बटुकेश्वर दत्त’ की।
वही बी.के. दत्त, जो चाहते तो बम फेंककर भाग सकते थे। लेकिन वे वहां डटे रहे, ताकि दुनिया को बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुंचा सकें।
भगत सिंह को फांसी मिली और वो अमर हो गए। लेकिन बटुकेश्वर दत्त को मिली ‘काला पानी’ की सजा।
अंग्रेजों की जेल में उन्होंने यातनाएं सही। लगा कि आजादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन विडंबना देखिए।
आजाद भारत में इस क्रांतिकारी को पेट पालने के लिए एक सिगरेट कंपनी में एजेंट की नौकरी करनी पड़ी। बिस्कुट बनाने का काम करना पड़ा।
हद तो तब हो गई जब बिहार सरकार ने उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का ‘प्रमाण पत्र’ मांग लिया।
सोचिए, जिसने जवानी जेल में बिता दी, उससे कागज मांगे गए।
पटना के अस्पताल में जब उनकी हालत बिगड़ी, तो उनके पास इलाज तक के पैसे नहीं थे। जब तक सरकार को होश आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मरते वक्त उनकी बस एक ही इच्छा थी- “मेरा अंतिम संस्कार उसी जगह करना जहां मेरे दोस्त भगत सिंह का हुआ था।”
आज हम भगत सिंह की फोटो टी-शर्ट पर लगाकर घूमते हैं। लेकिन उस साथी को भूल गए जो ताउम्र तिल-तिल कर मरा।
अंग्रेजों ने उन्हें जेल दी, लेकिन अपने ही देश ने उन्हें उपेक्षा दी।
क्या आजादी सिर्फ उन्हीं की है जो फांसी पर झूल गए? क्या जो बच गए और घुट-घुट कर जिए, उनका कोई मोल नहीं?
अगली बार जब आजादी का जश्न मनाएं, तो एक पल रुककर सोचिएगा जरूर।
शायद हमें आजादी तो मिल गई, लेकिन हम अपने नायकों को सम्मान देना भूल गए।
इस सच को साझा करें, ताकि इतिहास की किताबों के बाहर भी लोग बटुकेश्वर दत्त को जान सकें।





