अगस्त 1945 की शुरुआत थी। जर्मनी पहले ही आत्मसमर्पण कर चुका था, लेकिन जापान अब भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। अमेरिका, जो पहले ही युद्ध में भारी संसाधन झोंक चुका था, अब इसे जल्दी खत्म करना चाहता था। इसी जल्दबाज़ी और रणनीतिक सोच ने जन्म दिया मानव इतिहास की सबसे विनाशकारी घटनाओं में से एक को — हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराना।
6 अगस्त 1945 की सुबह, जापान के लोग एक सामान्य दिन की शुरुआत कर रहे थे। आकाश साफ़ था, कोई हवाई हमला अलर्ट नहीं था। तभी अचानक एक अकेला अमेरिकी बॉम्बर विमान — “एनोला गे” — हिरोशिमा के ऊपर से गुज़रा। उस विमान में था ‘लिटिल बॉय’ नाम का पहला परमाणु बम। सुबह 8:15 बजे जैसे ही बम गिरा, कुछ ही सेकंड में पूरा शहर जलते हुए धुएं में बदल गया। 70,000 से ज्यादा लोग उसी क्षण मारे गए। हज़ारों घायल हुए। जो बचे, वे रेडिएशन के असर से धीरे-धीरे मरने लगे।
जापानी नेतृत्व स्तब्ध था। लेकिन फिर भी, उन्होंने आत्मसमर्पण की घोषणा नहीं की।
तीन दिन बाद, 9 अगस्त को अमेरिका ने दूसरा बम — ‘फैट मैन’ — नागासाकी पर गिराया। वहाँ भी हज़ारों जानें गईं। कुछ ही घंटों में दो शहर खाक हो चुके थे, और जापान की रीढ़ टूट चुकी थी।
जिन लोगों ने इन विस्फोटों को झेला, उन्हें “हिबाकुशा” कहा गया — जीवित बचे लोग, जो मौत के साए में जीते रहे। उनकी आँखों में सिर्फ़ उजड़ापन और पीड़ा बची थी। कुछ ने अपनी आपबीती सुनाई, कई तो बस चुप ही रह गए।
ये कोई आम बम नहीं थे। ये इंसानियत के सबसे घिनौने फैसलों में से एक का हिस्सा थे — जहां एक युद्ध को खत्म करने के लिए पूरी की पूरी आबादी को बलि का बकरा बना दिया गया।
परमाणु बमों का असर सिर्फ़ विनाश तक सीमित नहीं रहा। इसका असर जापान की सामूहिक चेतना पर पड़ा। लोगों के सोचने, जीने और विश्वास करने के तरीके बदल गए। युद्ध की क्रूरता और राजनीतिक फैसलों की कीमत जापान के आम नागरिकों ने चुकाई।
13 अगस्त तक जापान के सम्राट हिरोहितो को अब स्पष्ट हो गया था कि लड़ाई अब और नहीं लड़ी जा सकती। 15 अगस्त को उन्होंने पहली बार रेडियो पर देश को संबोधित किया और आत्मसमर्पण की घोषणा की। यह जापानी इतिहास में पहली बार था जब आम लोगों ने अपने सम्राट की आवाज़ सुनी।
हिरोशिमा और नागासाकी का जिक्र जब भी होता है, वह सिर्फ़ बम और युद्ध की कहानी नहीं होती — वह इंसानियत की सबसे दर्दनाक गलती का स्मारक बन चुकी है।





