Tuesday, February 24, 2026
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    सिर्फ़ पौष्टिकता ही नहीं, इतिहास और संस्कृति छुपाए हुए है पोहा

    गजेंद्र कुमार साहू ।पोहा हर घर में, होटलों में आसानी से मिलने वाला नास्ता है। इसका सभी अपने स्वादानुसार छोले, तरी, मसाला या चटनी के साथ इसका आनंद लेते हैं। पोहा हल्का नाश्ता के रूप में जाना जाता है। पोहा न केवल स्वाद में अच्छा बल्कि पौष्टिक भी होता है, साथ ही साथ इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी है।

    यह हमारे लिए गर्व करने वाली बात है कि इतिहासकारों के अनुसार पोहा की उत्पत्ति का प्राचीन भारत से माना जाता है, जहां चावल मुख्य भोजन था। चावल को हल्का उबालने की तकनीक थी, जिसमें चावल के दानों को सूखाने और चपटा करने से पहले हल्का से पकाना होता है।

    माना जाता है कि पोहा सबसे पहले महाराष्ट्र में अस्तित्व में आया। होल्कर और सिंधिया के शासन के तहत, इस व्यंजन ने लोगों के बीच व्यापक लोकप्रियता हासिल की। जब शासक महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश आए, तो उन्होंने इंदौर पर कब्ज़ा कर लिया और अन्य चीज़ों के अलावा पोहा को अपने साथ ले आए। इतिहास बताता है कि ये व्यंजन होल्कर और सिंधिया की विरासत का हिस्सा है। राजा-महाराजाओं खाने के बेहद शौकीन थे और वे ख़ान-पान में नए प्रयोग के समर्थक भी थे। इन्हीं प्रयोगों में पोहा का आविष्कार हुआ।

    पोहा का एक जुड़ाव महाकाव्य “महाभारत” में भी देखने को मिलता है। इसका वर्णन तब आता है जब सुदामा ने अपने बचपन के दोस्त कृष्ण को चावल के दानों की पेशकश की थी और मुट्ठी भर चावल के दानों के कई किस्से मशहूर है।

    सांस्कृतिक रूप से परिपूर्ण इस देश में कई पोहा भी अपनी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। पोहा का भारत के पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों में विशेष सांस्कृतिक महत्व है। महाराष्ट्र में, यह गणेश चतुर्थी और दिवाली जैसे उत्सव के अवसरों पर परोसा जाने वाला एक प्रमुख व्यंजन है। यह पारंपरिक महाराष्ट्रीयन नाश्ते का एक अभिन्न अंग है, जिसे “कांदा पोहा” के नाम से जाना जाता है, जहां स्वाद बढ़ाने के लिए प्याज और मसाले मिलाए जाते हैं। इन त्योहारों के दौरान पोहा तैयार कर एक-दूसरे को बांटना एकजुटता और परंपरा का प्रतीक है।

    तो अब आप जब भी पोहा का आनंद ले तो इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को भी याद करें और सिंधिया और होलकर की विरासत को भी सलाम कर सकतें हैं।

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