- मोदी के जन्मदिन पर 15 दिन का जश्न, करोड़ों के आयोजन और सवाल—दिए में तेल कितना गया, रोशनी कितनी हुई?
– कमल कुमार मेश्राम
पाकिस्तान कर्ज में डूबा है—यह बताने में भारतीय राजनीति को बड़ा आनंद आता है। टीवी की बहसों में आंकड़े आते हैं, भाषणों में पाकिस्तान की बदहाली गिनाई जाती है और सोशल मीडिया पर कंगाली के मीम बनते हैं। लेकिन कभी कोई यह पूछने की हिम्मत करेगा कि भारत का आम आदमी कितना कर्ज में दबा है?
यह सवाल शायद इसलिए कठिन है, क्योंकि इसका जवाब किसी दूसरे देश की तरफ उंगली उठाकर नहीं दिया जा सकता।
आज देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जा रहा है। जगह-जगह कार्यक्रम, सेवा अभियान, आयोजन, प्रचार और उत्सव का माहौल है। सवाल यह नहीं कि जन्मदिन क्यों मनाया जा रहा है। सवाल यह है कि 15 दिन तक चलने वाले इन आयोजनों में कितना सार्वजनिक धन खर्च हो रहा है, प्राथमिकताएं क्या हैं और आम आदमी को इससे क्या हासिल हो रहा है?
दिए में तेल डालकर रोशनी करना बुरी बात नहीं है। लेकिन अगर घर का चूल्हा जलाने के लिए तेल ही महंगा हो जाए तो उस रोशनी का अर्थ भी पूछना पड़ेगा।
एक तरफ प्रधानमंत्री का जन्मदिन उत्सव बन जाता है, दूसरी तरफ वही देश का आम नागरिक अपनी EMI, बच्चों की फीस, किराना, इलाज, मकान और रोजमर्रा के खर्च का हिसाब लगाकर परेशान है।
एक तरफ 15 दिन का कार्यक्रम, दूसरी तरफ 30 दिन का घरेलू बजट—फर्क सिर्फ इतना है कि सरकार का कार्यक्रम खत्म हो जाता है, लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार की चिंता खत्म नहीं होती।
सवाल मोदी के जन्मदिन मनाने का नहीं है। सवाल यह है कि जन्मदिन के बहाने देश को क्या संदेश दिया जा रहा है?
क्या संदेश यह है कि देश बहुत खुशहाल है?
क्या संदेश यह है कि सरकार के कामकाज से जनता पूरी तरह संतुष्ट है?
क्या संदेश यह है कि बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और कर्ज जैसी समस्याएं अब पीछे छूट चुकी हैं?
या फिर यह राजनीति का वह नया उत्सव है, जिसमें उपलब्धियों से ज्यादा उपलब्धियों का प्रचार महत्वपूर्ण हो गया है?
मोदी का जन्मदिन मनाइए, शुभकामनाएं दीजिए, सेवा कीजिए—लोकतंत्र में किसी नेता के प्रति समर्थन या सम्मान जताना जनता का अधिकार है। लेकिन पत्रकारिता का काम सिर्फ तालियां बजाना नहीं, तालियों के बीच छिपे सवालों को सुनना भी है।
और सवाल बड़ा सीधा है—
जिस देश का नागरिक अपनी आमदनी और खर्च के बीच फंसा हुआ है, उसके लिए इन 15 दिनों का उत्सव आखिर कितना मायने रखता है?
किसान कर्ज में है। छोटा व्यापारी बाजार के दबाव में है। युवा रोजगार की तलाश में है। मध्यमवर्ग EMI में बंधा है। परिवार बच्चों की शिक्षा और इलाज के खर्च से जूझ रहा है।
फिर भी राजनीति हमें बार-बार बताती है—देखिए पाकिस्तान कितना कर्ज में है!
भाई साहब, पाकिस्तान को बाद में देख लेंगे।
पहले अपने घर की गुल्लक तो देख लीजिए।
पाकिस्तान की आर्थिक हालत पर सवाल होना चाहिए, लेकिन भारत के नागरिक की आर्थिक हालत पर सवाल उससे कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकता।
सरकारें बदलती हैं। नारे बदलते हैं। चुनावी चेहरे बदलते हैं। झंडे बदलते हैं। लेकिन जनता का सवाल वही रहता है—
- रोजगार कब मिलेगा?
- महंगाई कब कम होगी?
- आमदनी कब बढ़ेगी?
- कर्ज का बोझ कब घटेगा?
और जनता के जीवन में वास्तविक बदलाव कब दिखाई देगा?
मोदी के जन्मदिन पर 15 दिन का कार्यक्रम हो या किसी दूसरे नेता का जन्मोत्सव—लोकतंत्र में उत्सव मनाने से ज्यादा जरूरी है कि उत्सव के बाद जनता के घर की स्थिति क्या बदली, यह देखा जाए।
क्योंकि देश केवल बड़े मंचों, बड़े पोस्टरों और बड़े आयोजनों से खुशहाल नहीं होता।
देश तब खुशहाल होता है जब उसके नागरिक को महीने की आखिरी तारीख से डर न लगे।
जब बच्चे की फीस भरने के लिए कर्ज न लेना पड़े।
जब बीमारी घर का बजट न बिगाड़ दे।
जब युवा नौकरी के लिए दर-दर न भटके।
और जब आदमी यह सोचकर न सोए कि अगली EMI कहां से आएगी?
इसलिए सवाल पाकिस्तान से नहीं, आज भारत से है।
मोदी जी का जन्मदिन 15 दिन मनाइए, 30 दिन मनाइए या 365 दिन मनाइए—लेकिन देश के आम आदमी की जिंदगी में अगर एक दिन भी आर्थिक राहत नहीं आई, तो फिर जनता पूछेगी कि आखिर यह उत्सव किसके लिए था?
दिए में रोशनी जरूर कीजिए,
लेकिन यह भी देखिए कि कहीं उस दिए का तेल जनता की जेब से तो नहीं आ रहा।






