भाटापारा के युवाओं के बीच बढ़ रही बेरोजगारी

भाटापारा ,बुजुर्गों से चर्चा एवं क्षेत्र के संबंध मे उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज के आधार पर भाटापारा का इतिहास लगभग 150 से 200वर्ष का माना जाता है, अवरेठी और हथनी ग्राम के बीच बड़ा परिक्षेत्र भाठा भूमि थी जानकारी मिलती है कि कालांतर मे यही पर व्यवसायिक गतिविधियों का संचालन हुआ एवं आसपास के गांवों के लिए यह स्थल बाजार के रुप मे परिवर्तित हो गया तथा भाठाभूमि मे बसाहट भाटापारा के नाम से चिन्हांकित भी हो गयी, और व्यापारिक पृष्टभूमि क्षेत्र की अहम पहचान भी बन गयी, व्यापारिक पृष्ठभूमि अर्थात उद्यमशीलता की पहचान और जहां व्यापार वहां सहज ही रोजगार तथा यह परिलक्षित भी होती है,

मंडी एवं मिलों का व्यापक संसारः

भाटापारा के आसपास के क्षेत्र जहां विस्तृत कृषि क्षेत्र के रुप मे अहम पहचान रखते है

बेरोजगारी

वहीं इससे जुड़ी व्यापारिक प्रकल्प कृषि उपज मंडी भाटापारा मे स्थापित होने से आसपास जिलों के कृषि उत्पाद भी भाटापारा मे विक्रय के लिए पंहुचते है, और यही समृद्ध परिस्थिति भाटापारा मे बड़ी संख्या मे दाल मील पोहा मील एवं राइस मीलों के स्थापित होने की अहम वजह है, कृषि उपज मंडी एवं विभिन्न मीलों से सुसज्जित भाटापारा मे सहज ही रोजगार के अवसर हैं एवं परिश्रम एवं हुनर को प्राथमिकता है तथा क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले इन प्रकल्पों मे क्षेत्र की बड़ी आर्थिक निर्भरता भी नजर आती है।

उच्च शिक्षा में गहराती बेरोजगारी

जो हुनर के प्रकल्प होते है वहां यह मायने नहीं रखता है कि किताबों एवं डिग्री की शिक्षा मे कितनी दक्षता है, वहां स्थान और प्राथमिकता केवल हुनरशीलता एवं परिश्रम को प्राप्त होती है, भाटापारा मे स्थापित प्रकल्पों मे यही परिस्थिति नजर आती है, लिहाजा उच्च शिक्षा प्राप्त किन्तु हुनरविहिन युवाओं को उद्यमशीलता की नगरी में भी बेकारी का सामना करने के परिदृश्य नजर आ रहे है।

शासकीय नौकरी के प्रति आकर्षण

नीति आयोग की रिपोर्ट आने से इस विषय पर चर्चा का बाजार गर्म नजर आ रहा है जिसकी बानगी भाटापारा मे भी नजर आ रही है, रिपोर्ट कहती है कि देश मे करीब 837 करोड़ युवा न पढ़ाई कर रहें है और न ही कोई रोजगार, इस रिपोर्ट के साथ ही विश्लेषण की कड़ी भी उभरती हुई नजर आ रही है, जिसकी बानगी यही कह रही हैं कि सिलेबस शिक्षा तो युवाओं के पास है लेकिन हुनर का अभाव है, वहीं शासकीय नौकरी को ही रोजगार का पर्याय मानने की मानसिकता भी युवाओं को बेकारी की ओर धकेल रही है।

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