दीपक अवस्थी संपादक।डोंगरगांव में इतवार की सुबह । नवरात्र शुरू होने से पहले का दिन। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण बचपन से यह संस्कार था कि नवरात्रि में बाल नहीं कटवाते। सोचा, जल्दी से नाश्ता निबटा दूँ और बाल भी कटवा लूँ। एक बचपन का मित्र साथ हो लिया और हम दोनों नाई की दुकान जा पहुँचे।
कुर्सी पर बैठते ही नाई की कैंची चली और बातों का पिटारा खुल गया। शुरुआत क्रिकेट से हुई—भारत–पाकिस्तान मैच की। अचानक नाई बोला—“आज अन्ना में अच्छा भाव मिलेगा भैया।” मैं चौंका—“अन्ना? किसका भाव?” उसने इत्मीनान से बताया कि ये ऑनलाइन बेटिंग एप है। “पैसे भी तुरंत आ जाते हैं।” मैंने कहा—“भाई, बैटिंग ऐप तो बंद हो गए।” वह मुस्कराया—“नहीं भैया, सब टैक्स देकर चल रहा है।”
मैंने बात पलटने के लिए पूछ लिया—“तुम्हें जेल जाने से डर नहीं लगता?” तात्कालिक जवाब आया—“भैया, पिछले महीने ही तो जेल से छुटा हूँ।” उसने बताया, किसी परिचित ने नौकरी लगाने के नाम पर ठगी कर ली और उस ठगी के पैसे मेरे खाते में डलवा दिए। मामला दर्ज हुआ मुझे और उसे जेल जाना पड़ा। “ठगी वाला तो अभी भी अंदर है, मैं तो जमानत पर बाहर आ गया,” वह हंसते हुए बोला।
मैंने मज़ाक में कहा—“जेल में तुम्हारा स्वागत नहीं हुआ?” वह बोला—“नहीं भैया, बालोद जेल अच्छी है। जेलर मैडम भी बहुत अच्छी थीं। नब्बे दिन आराम से गुज़ारे, सब दोस्त बन गए। राजनांदगांव से वकील साहब ने गारंटी देकर हाईकोर्ट से जमानत करवाई।”
इतना सहज, इतना आनंद लेते हुए उसने जेल की दास्तान सुनाई कि लगा जैसे कोई छुट्टी मनाकर लौटा हो। मेरे सिर के बाल ज़रूर कट गए, मगर नाई ने जिस अंदाज़ में अपराध और जेल के सफर को साझा किया, उससे लगा—जेल जाना अब डर का नहीं, बल्कि अनुभव और गर्व का विषय बन चुका है। मानो कोई ट्रॉफी जीतकर आया हो।





