डोंगरगांव(दीपक अवस्थी)।नगर पंचायत डोंगरगांव की टीम का हालिया “अध्ययन एवं सांस्कृतिक दौरा” अब भ्रष्टाचार, मनमानी और पारदर्शिता के उल्लंघन का प्रतीक बनकर उभरा है। अध्यक्ष अंजू त्रिपाठी और मुख्य नगरपंचायत अधिकारी विनम्र जेमा के नेतृत्व में टीम ने बस्तर के चित्रकोट जलप्रपात, बारसुर के प्राचीन मंदिरों, दंतेवाड़ा के मां दंतेश्वरी मंदिर, तीरथगढ़ जलप्रपात और जगदलपुर राजमहल का भ्रमण किया। नगर पंचायत का दावा है कि उद्देश्य “अध्ययन और सांस्कृतिक जानकारी” था — लेकिन दस्तावेज़ कुछ और कहानी कह रहे हैं।
बिना मंजूरी, बिना सूचना – नियमों की उड़ाई धज्जियां
सूत्रों के मुताबिक इस “अध्ययन भ्रमण” के लिए न तो पीआईसी की स्वीकृति ली गई और न ही प्रशासनिक अनुमति। एसडीएम श्रीकांत कोराम ने स्वयं स्वीकार किया —
“नगर पंचायत से किसी प्रकार की लिखित सूचना नहीं मिली थी। जब वे बस्तर पहुंच गए, तब फोन पर बताया कि भ्रमण पर हैं। अब जब पहुंच ही गए, तो क्या कहा जा सकता था।”
इस बयान ने नगर पंचायत की नियमों को ताक पर रखकर की गई मनमानी को खुलकर उजागर कर दिया है।
सवाल जो नगर पंचायत को कटघरे में खड़ा करते हैं
- यदि यह दौरा अधिकारीक था, तो छह पार्षदों को क्यों दरकिनार किया गया?
- केवल चार कर्मचारियों को ही क्यों शामिल किया गया — क्या चयन में पारदर्शिता थी?
- प्रशासनिक अनुमति पत्र कब और किस अधिकारी ने जारी किया?
- यदि यह दौरा स्वयं के व्यय पर था, तो इसे “अधिकारीक भ्रमण” क्यों कहा जा रहा है?
- शामिल कर्मचारियों का वेतन किस आधार पर आहरित किया जाएगा — उपस्थित मानकर या अनुपस्थित रहते हुए?
- क्या इस भ्रमण की रिपोर्ट और व्यय विवरण नगर पंचायत के अभिलेखों में दर्ज हैं?
- यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था, तो आदेश और मंजूरी पत्र सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए?
“अध्ययन” के नाम पर सैर-सपाटा?
स्थानीय नागरिकों के बीच यह चर्चा गर्म है कि यह दौरा जनता के पैसों पर की गई सैर-सपाटा थी। जब न पीआईसी की मंजूरी थी, न प्रशासनिक अनुमति, तो सवाल उठना लाजमी है कि आखिर यह दौरा किस हैसियत में किया गया?
जवाबदेही से नहीं बच पाएगी नगर पंचायत
यह मामला सिर्फ़ एक भ्रमण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न है। यदि नगर पंचायत इस दौरे की रिपोर्ट और खर्च का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं करती, तो यह प्रकरण जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई का विषय बनेगा।





