डोंगरगांव की नगर पंचायत ने आखिरकार विकास का नया मॉडल खोज ही लिया

(दीपक अवस्थी) डोंगरगांव की नगर पंचायत ने आखिरकार विकास का नया मॉडल खोज ही लिया।

अब यहां टेंडर कागज़ों से नहीं, थप्पड़ों की ताकत से पास होते दिखाई दे रहे हैं।

कहते हैं लोकतंत्र संवाद से चलता है,

लेकिन निकाय व्यवस्था अब “घूंसा तंत्र” की ओर बढ़ चुकी है।

एक तरफ डिप्लोमा धारी इंजीनियर, दूसरी तरफ मुक्केबाज पेटी ठेकेदार…

और बीच में कमीशन का ऐसा पवित्र रिश्ता,

जिसे बचाने के लिए सरकारी दफ्तर भी अखाड़ा बनने को तैयार है।

पूर्ववर्ती सरकारों से चली आ रही एडवांस रिश्वत की परंपरा अब इतनी संस्कारी हो चुकी है

कि भुगतान रुकते ही संस्कार सीधे हाथापाई में बदल जाते हैं।

नगर पंचायत का इंजीनियर शायद पहली बार समझ पाया होगा

कि “साइट निरीक्षण” और “सीधा निरीक्षण” में कितना अंतर होता है।

उधर ठेकेदार भी पूरे आत्मविश्वास में दिखा।

मानो कह रहा हो—

“जब पूरा सिस्टम प्रतिशत पर चलता है,

तो थोड़ा बहुत प्रहार भी विकास कार्य का हिस्सा समझिए…”

मामला थाने पहुंच गया।

पुलिस रेफरी बनी बैठी है।

इंजीनियर चोट सहला रहा है और ठेकेदार रंगदारी का वजन नाप रहा है।

लेकिन असली तमाशा तो ये है कि

इस लड़ाई में किसी को भ्रष्टाचार पर शर्म नहीं है…

चिंता सिर्फ इतनी है कि हिस्सा समय पर क्यों नहीं पहुंचा।

नेता, सलाहकार, अफसर, ठेकेदार—

सब विकास की गंगा में अपने-अपने प्रतिशत की डुबकी लगा रहे हैं।

जनता भी समझदार है,

उसे मालूम है कि सड़क बाद में बनेगी,

पहले कमीशन की नींव मजबूत की जाएगी।

डोंगरगांव छोटा शहर जरूर है,

लेकिन यहां का सिस्टम बड़े-बड़े राजनीतिक शोध संस्थानों को सामग्री दे सकता है।

जहां सरकारी दफ्तरों में फाइलें कम और फाइट ज्यादा चल रही हो,

वहां विकास नहीं, “व्यवस्था का व्यायाम” हो रहा होता है।

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