विशेष संवाददाता, जयपुर राजस्थान। शिक्षा विभाग द्वारा सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाने का एक नया और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद (RCScE) द्वारा जारी एक हालिया आदेश के बाद प्रदेशभर के शिक्षक आंदोलित हो उठे हैं। इस नए आदेश के तहत शिक्षकों को बच्चों के पेट में कीड़ों की जांच (डी-वर्मिंग असेसमेंट) के लिए उनके घर-घर जाकर मल (Stool) के नमूने एकत्र करने का जिम्मा सौंपा गया है।इस आदेश के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही शिक्षक संगठनों ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया है और इसे शिक्षकों की गरिमा के खिलाफ बताया है।
क्या है पूरा मामला और सरकारी आदेश?
दरअसल, राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद के परियोजना निदेशक द्वारा प्रदेश के मुख्य जिला शिक्षा अधिकारियों को एक पत्र जारी किया गया था। इस पत्र के अनुसार, राज्य के 25 जिलों में स्कूली बच्चों के पेट में कीड़ों की स्थिति का पता लगाने के लिए ‘डिवर्म द वर्ल्ड इनीशिएटिव’ (Deworm the World Initiative) संस्था के सहयोग से एक सर्वे किया जाना है।नियम: प्रत्येक सरकारी स्कूल से करीब 50-50 बच्चों का चयन किया जाना है।कार्य: इन बच्चों के अभिभावकों की सहमति से उनके घरों से मल के नमूने (Stool Samples) एकत्र करने हैं।
शिक्षकों की भूमिका:
आदेश के मुताबिक, सैंपलिंग करने वाली संस्था के प्रतिनिधियों के साथ शिक्षकों को भी घर-घर जाना होगा, अभिभावकों को समझाना होगा और इस पूरी प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग करना होगा।शिक्षकों में भारी आक्रोश: “हम शिक्षक हैं या सफाईकर्मी?”इस आदेश के बाद से ही शिक्षक संघों में भारी रोष व्याप्त है। सोशल मीडिया पर “शिक्षकों से मल मंगवाएगी सरकार” जैसी खबरों की कटिंग्स तेजी से वायरल हो रही हैं।शिक्षक नेताओं का कहना है कि सरकार शिक्षकों को पढ़ाने के अलावा जनगणना, चुनाव, राशन कार्ड, और पशु गणना जैसे हर गैर-शैक्षणिक काम में झोंक देती है। लेकिन इस बार तो हद ही पार हो गई है। शिक्षक संघों के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह कार्य पूरी तरह से चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग (ANM, आशा सहयोगिनी या नर्सिंग स्टाफ) का है, इसे शिक्षकों पर थोपना अनुचित और उनकी गरिमा के साथ खिलवाड़ है।
प्रशासन की सफाई:
“शिक्षकों को सिर्फ समन्वय (Coordination) करना है”विवाद बढ़ता देख शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों और जिला शिक्षा अधिकारियों ने इस मामले पर सफाई दी है। अधिकारियों का कहना है कि शिक्षकों को खुद अपने हाथों से मल के नमूने नहीं उठाने हैं। नमूने एकत्र करने का काम संबंधित एनजीओ (NGO) के वॉलिंटियर्स ही करेंगे। शिक्षकों को केवल एक ‘लॉन्चिंग पैड’ या ‘मध्यस्थ’ के रूप में बच्चों के घरों तक जाना है और अभिभावकों को इस स्वास्थ्य अभियान के प्रति जागरूक कर सहमति दिलवानी है ताकि सर्वे का काम सुचारू रूप से हो सके।
एकल और ग्रामीण स्कूलों में बढ़ेगी मुसीबत
शिक्षकों का तर्क है कि प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जो ‘एकल शिक्षक’ (यानी सिर्फ एक टीचर के भरोसे) चल रहे हैं या जहाँ पहले से ही स्टाफ की भारी कमी है। ऐसे में अगर शिक्षक बच्चों के घर-घर जाकर इस तरह के सर्वे और सैंपलिंग के कामों में उलझे रहेंगे, तो स्कूलों में पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाएगी।
शिक्षक संगठनों की चेतावनी:
शिक्षक संघों ने साफ कर दिया है कि यदि सरकार ने इस आदेश को तुरंत संशोधित नहीं किया और स्वास्थ्य संबंधी इस कार्य से शिक्षकों को मुक्त नहीं किया, तो वे इस सर्वे का पूर्ण बहिष्कार करेंगे और सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन करेंगे।






