आजादी के अनसुने किस्से : कागज़ पर चली पेन की वह खूनी लकीर: एक अजनबी सनकी फैसले ने रातों-रात बदल दी करोड़ों की तकदीर

भारत और पाकिस्तान को अलग करने वाली रेडक्लिफ लाइनमात्र सरहद की कोई रेखा नहीं है, बल्कि यह मानव इतिहास के सबसे विभिषिका भरे और जल्दबाजी में रचे गए फैसलों का जीवंत दस्तावेज है, जिसके पीछे छुपे Cyril Radcliffe के अनसुने संस्मरण आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। वर्ष 1947 में जब ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत छोड़ने का मन बनाया, तो पंजाब और बंगाल के भौगोलिक व सामाजिक ताने-बाने को चीरकर दो नए राष्ट्र खड़े करने की खौफनाक जिम्मेदारी एक ऐसे शख्स को थमा दी गई, जिन्होंने इससे पहले कभी भारत की जमीन पर कदम तक नहीं रखा था और जिन्हें यहाँ की आबोहवा का कोई अनुभव नहीं था, उन्हें मात्र पांच हफ्तों के भीतर करोड़ों इंसानों के भविष्य का फैसला करने वाली लकीर खींचने का फरमान सुनाया गया था।रेडक्लिफ से जुड़े अनसुने संस्मरणों के पन्ने पलटें तो यह पता चलता है कि वे खुद इस भयानक काम के मनोवैज्ञानिक दबाव और अपनी ही अज्ञानता से कितने विचलित थे। भारत पहुँचने पर जब उन्हें अहसास हुआ कि उनके एक गलत स्ट्रोक से लाखों लोगों की जान दांव पर लग जाएगी, तो उन्होंने भारत सरकार द्वारा दी जाने वाली 40,000 रुपये की भारी-भरकम फीस लेने से साफ इंकार कर दिया था। इतना ही नहीं, कलकत्ता और लाहौर के बीच लकीर खींचने के बाद वे इतनी बुरी तरह घबराए हुए थे कि भारत से लौटते वक्त उन्होंने अपने सारे निजी दस्तावेज, नोट्स और डायरियां हवाई अड्डे पर ही जलवा दीं ताकि इतिहास कभी यह न जान सके कि उन्होंने किस मानसिक स्थिति और दबाव में आकर यह खूनी रेखा खींची थी।राजधानी दिल्ली के एक बंद कमरे में बैठकर पुराने नक्शों के सहारे रेडक्लिफ द्वारा चलाई गई उस पेंसिल ने सरहद के दोनों तरफ बसे गांवों और घरों के बीचों-बीच ऐसी लकीरें खींच दीं कि सीमावर्ती इलाकों के किस्से आज भी आंखों में आंसू ले आते हैं, जहां किसी का बैठक कक्ष हिंदुस्तान में रह गया तो उसका आंगन पाकिस्तान की सीमा में चला गया और कई किसानों के सोते हुए आशियाने एक देश में रह गए जबकि उनके लहलहाते खेत रातों-रात दूसरे मुल्क का हिस्सा बन गए। इस नक्शे का सबसे त्रासद पहलू यह था कि इसका आधिकारिक ऐलान भारत को 15 अगस्त को स्वतंत्रता मिलने के दो दिन बाद यानी 17 अगस्त 1947 को किया गया, यानी जब दोनों मुल्क जश्न मना रहे थे, तब बेखबर लोग यह तक नहीं जानते थे कि वे किस देश में हैं और नक्शा खुलते ही शुरू हुए उस वीभत्स विस्थापन ने सदियों पुराने भाईचारे को नफरत की आग में झोंक दिया।

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