घनश्याम साव ,डोंगरगांव। रियासत कालीन इतिहास, आस्था और नगर की प्यास बुझाने का प्रतीक डोंगरगांव का ऐतिहासिक बड़ा तालाब (रानी तालाब) आज नगर पालिका प्रशासन की घोर अनदेखी और राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है। सवा सौ साल से अधिक पुराने इस ऐतिहासिक तालाब की बदहाली अब इस कदर बढ़ चुकी है कि यह न केवल अपनी पहचान खोने की कगार पर है, बल्कि नगरवासियों के लिए एक बड़े हादसे और महामारी का सबब बनने को तैयार बैठा है।

तालाब के पानी में व्यापक गंदगी, काई और सड़ांध मारती बदबू फैली हुई है। इस दूषित पानी से हर वक्त बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन मजबूरी वश लोग आज भी इसी पानी में निस्तारी करने को विवश हैं। तालाब की पार पर खरपतवार और झाड़ियों का कब्जा हो चुका है। सबसे ज्यादा खौफनाक स्थिति तालाब की जर्जर सीमेंटेड पार की है। पार का एक बड़ा हिस्सा या तो गहरी दरारों की चपेट में है या फिर ढहकर तालाब के पेट में समा चुका है।किनारे से चलना सीधे मौत को दावत देना जैसा है।
तालाब बड़ा होने के कारण इसकी पार से रोजाना चार पहिया वाहनों का आना-जाना होता है। चूंकि नगर का मुख्य मुक्तिधाम (श्मशान घाट) भी इसी तालाब से लगा हुआ है, इसलिए रोजाना दर्जनों लोगों की आवाजाही बनी रहती है। डर इस बात का है कि जिस दिन इस कमजोर और जर्जर हो चुकी पार ने दम तोड़ा, उस दिन जो तबाही मचेगी उसे संभालना पालिका प्रशासन के बस में नहीं होगा।
बावली का अस्तित्व बच पायेगा या नही…
तालाब के ठीक बाजू में स्थित प्रसिद्ध हनुमान मंदिर के पीछे बनी ऐतिहासिक बावली की स्थिति भी बेहद चिंतनीय है। उचित रखरखाव न होने और खरपतवार के जंगल में तब्दील हो जाने के कारण यह ऐतिहासिक बावली अब अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें गिन रही है।
नेताओं को कॉलर ऊंची करने से फुर्सत नहीं, नगर के उद्धार की किसे परवाह?
नगर में भाजपा और कांग्रेस के कद्दावर नेताओं की कोई कमी नहीं है। मंचों पर अपनी कॉलर ऊंची कर बड़े-बड़े दावे करने वाले इन नेताओं को शहर की ऐतिहासिक धरोहरों की तनिक भी चिंता नहीं है। इस बड़े तालाब को मछुआ संघ ने मत्स्य आखेट के लिए 10 वर्ष के लिए ली है।मछुआ संघ इस हेतु नगर पालिका को वार्षिक राशि संघ से मिलती है। लेकिन तालाब के रखरखाव पालिका का जरा भी ध्यान नही है। यदि नेताओं और जिम्मेदार तंत्र की यही बेरुखी बनी रही, तो इतिहास की गवाही देने वाले इन प्रमुख स्थलों के पूरी तरह सत्यानाश होने का सेहरा इन्हीं तथाकथित नेताओं के सिर बंधेगा!
इतिहास के झरोखे से जब राजा बलरामदास ने दूर की थी ग्रामवासियों की तड़प,
यह बड़ा तालाब सन् 1895 के आसपास अस्तित्व में आया था। उस समय डोंगरगांव छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा एक छोटा सा गांव था, जहाँ के लोगों को पानी की बूंद-बूंद के लिए भारी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। उस समय यहां के लोगों की निस्तारी घुमरिया नदी पर आश्रित थी। प्रजा की इस पीड़ा को देखकर राजनांदगांव रियासत के राजा बलरामदास वैष्णव ने संवेदनशीलता दिखाई और लगभग 25 एकड़ विशाल भूमि में इस बड़े तालाब का निर्माण करवाया।
राजनांदगांव के प्रसिद्ध ‘रानी सागर’ की तर्ज पर ही डोंगरगांव के इस बड़े तालाब को लोकमानस में ‘रानी तालाब’ के नाम से पहचान मिली।वक्त के साथ गांव से पंचायत, फिर नगर पंचायत और अब नगर पालिका का सफर तय हो गया। सवा सौ साल बीत जाने के बाद भी यह तालाब आज भी नगर की निस्तारी का मुख्य आधार बना हुआ है।
नगर के एकमात्र बड़े धरोहर को बचाए रखने के लिए नगर प्रशासन और जनप्रतिनिधियो को भी विशेष ध्यान देना चाहिए,






