मस्तूरी ब्लॉक के कई गांवों में यह स्थिति
कमलकांत पाटनवार
बिलासपुर/मस्तूरी
धान की फसल को अच्छी पैदावार के लिए अंतिम बार सिंचाई की जरूरत है। मौसम विभाग द्वारा नवरात्र के दौरान बारिश की संभावना जाहिर की गई थी, लेकिन बारिश नहीं हुई। मस्तूरी ब्लॉक में अधिकांश गांवों में खेत लगभग सूखने की स्थिति में हैं। हालत यह है कि फसल बचाने किसानों को आसपास के नाले व तालाबों से डीजल पंप लगाकर खेतों तक पानी पहुंचाना पड़ रहा है। दीवाली करीब है और धान में बालियां आने का समय आ चुका है। जल्दी व मध्यम अवधि वाली किस्मों को तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन लेट वेरायटी वाली धान की किस्मों को अभी एक पानी की और जरूरत है। मौसम विभाग द्वारा नवरात्र के बीच में सिस्टम के प्रभाव से दो से तीन दिनों की बारिश होने की बात कही गई थी। इस दौरान किसानों को पूरी उम्मीद थी कि बारिश से उनकी सारी जरूरतें पूरी हो जाएंगी। इधर दो से तीन दिनों की बारिश तो दूर एक दिन भी बारिश नहीं हुई। आसमान पर बादल छाते रहे लेकिन बिना बरसे ही बादलों की वापसी हो गई। अब कई गांवों में खेतों की हालत खराब नजर आ रही है। यह स्थिति मस्तूरी ब्लॉक में ज्यादातर नजर आ रही है। किसानों को डीजल पंप लगाकर दूरदराज के नालों छोटे बांधों से पानी खींचकर लाना पड़ रहा है। हालांकि इसके लिए उन्हें मोटी रकम भी खर्च करनी पड़ रही है। किराए पर मोटर पंप लाकर डीजल की व्यवस्था करने के बाद ही फसलों को पानी मिल पा रहा है। हालांकि फसल के लिए पानी की यह अंतिम जरूरत है, जिससे किसान भी पीछे नहीं हट रहे हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर किसानों को यह विकल्प भी नहीं
आर्थिक रूप से कमजोर किसानों के सामने अपनी फसल बचाने के लिए डीजल पंपों से सिंचाई वाला विकल्प भी नहीं है। किसानों के अनुसार वर्तमान में मिट्टी तेल की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में किसानों को पंप चलाने के लिए डीजल की खरीदी करनी होगी। सौ रूपए प्रति लीटर से भी अधिक कीमत पर डीजल खरीदकर फसल की सिंचाई करना कमजोर किसानों के लिए महंगा साबित हो रहा है। लिहाजा वे अब भगवान भरोसे ही नजर आ रहे हैं।
जहां नहर नहीं, वहां अधिक परेशानी
मस्तूरी क्षेत्र के ऐसे गांव जहां नहर की सुविधा नहीं है, वहां अधिक परेशानी है। उन गांवों के किसानों को गांव के छोटे बांध, तालाबों व नालों में भरे पानी से सिंचाई करनी पड़ रही है। वैसे तो मस्तूरी क्षेत्र के काफी गांवों में खारंग की नहर से पानी की सप्लाई होती है, लेकिन ऐसे गांवों की संख्या भी काफी है, जो असिंचित हैं। ऐसे गांवों को फसल बचाने अपने स्तर पर ही व्यवस्था करनी पड़ रही है।






