छत्तीसगढ़ उपचुनाव : बिलासपुर-जगदलपुर में कांग्रेस का परचम, किरण सिंहदेव के करीबी की हार, कई सीटों पर भाजपा की वापसी; 2028 की राजनीति का संकेत?

रायपुर। छत्तीसगढ़ के विभिन्न नगरीय निकायों और नगर पंचायतों में हुए उपचुनावों के नतीजे सामने आने के बाद प्रदेश की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। सबसे ज्यादा चर्चा बिलासपुर और जगदलपुर नगर निगम के उन वार्डों की रही, जहां कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज करते हुए अपने पारंपरिक गढ़ को बचा लिया। वहीं कई नगर पंचायतों और ग्रामीण निकायों में भाजपा ने भी दमदार प्रदर्शन कर मुकाबले को संतुलित बनाए रखा।

उपचुनाव के परिणामों के अनुसार कांग्रेस ने कुल 6 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि भाजपा के खाते में 3 सीटें गईं। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में मिले जनादेश ने यह भी संकेत दिया है कि स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ अब भी चुनावी परिणामों में बड़ी भूमिका निभा रही है।

जगदलपुर में कांग्रेस का गढ़ बरकरार

बस्तर मुख्यालय जगदलपुर नगर निगम के इंदिरा वार्ड में कांग्रेस प्रत्याशी रामकृष्ण तिवारी ने भाजपा उम्मीदवार मनोहर दत्त तिवारी को 436 मतों के अंतर से पराजित कर दिया। यह मुकाबला इसलिए भी खास था क्योंकि भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव के करीबी माने जाने वाले मनोहर दत्त तिवारी पर दांव लगाया था।

इंदिरा वार्ड लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है। पिछले लगभग तीन दशकों से इस वार्ड में कांग्रेस का कब्जा रहा है और इस बार भी पार्टी ने अपनी पकड़ बनाए रखी। चुनाव में आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी रुबीना कुरैशी भी मैदान में थीं, लेकिन मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच ही सिमट गया।

1 जून को हुए मतदान में कुल 1,542 मतदाताओं में से 1,223 लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इस सीट पर उपचुनाव कांग्रेस के वरिष्ठ पार्षद अब्दुल रशीद के निधन के बाद कराया गया था। अब्दुल रशीद लगातार चार बार पार्षद चुने गए थे और उनके परिवार का इस वार्ड में लंबे समय से प्रभाव रहा है। उनकी मां भी दो बार वार्ड का प्रतिनिधित्व कर चुकी थीं।

बिलासपुर में कांग्रेस ने दोहराया इतिहास

बिलासपुर नगर निगम के वार्ड क्रमांक-29 (संजय गांधी नगर) में कांग्रेस प्रत्याशी शेख आजम ने भाजपा के मधुसूदन राव को 1,062 मतों के बड़े अंतर से हराकर जीत दर्ज की। यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह वार्ड पिछले करीब 40 वर्षों से कांग्रेस का मजबूत आधार क्षेत्र माना जाता है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार मधुसूदन राव को इससे पहले शेख आजम के पिता शेख असलम भी चुनाव में पराजित कर चुके थे। इस वार्ड का राजनीतिक इतिहास भी दिलचस्प रहा है। पहले पार्षद शेख गफ्फार के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके भाई शेख असलम विजयी हुए थे। बाद में वे सामान्य चुनाव में भी पार्षद चुने गए। उनके निधन के बाद सीट रिक्त हुई और दोबारा उपचुनाव कराना पड़ा।

इस वार्ड में कुल 5,255 मतदाता थे, जिनमें से 3,665 लोगों ने मतदान किया। कांग्रेस की जीत ने यह संकेत दिया कि वार्ड में पार्टी का पारंपरिक जनाधार अभी भी मजबूत बना हुआ है।

इन क्षेत्रों में भाजपा ने दिखाई ताकत

जहां कांग्रेस ने कई महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज की, वहीं भाजपा ने भी कुछ क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत साबित की। सूरजपुर जिले की शिवनंदनपुर नगर पंचायत, कवर्धा जिले के सहसपुर लोहारा और जांजगीर-चांपा जिले के बमनीडीह क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशियों ने जीत हासिल की।

सूरजपुर में कुल 15 वार्डों के चुनाव हुए। दिलचस्प बात यह रही कि वार्डों में कांग्रेस को बहुमत मिला, लेकिन अध्यक्ष पद पर भाजपा प्रत्याशी रितेश जायसवाल विजयी रहे। इससे स्पष्ट हुआ कि स्थानीय स्तर पर मतदाताओं ने अलग-अलग पदों के लिए अलग-अलग राजनीतिक पसंद दिखाई।

कांग्रेस के खाते में घुमका, पलारी, चारामा और पखांजूर

राजनांदगांव जिले की घुमका नगर पंचायत में कांग्रेस की फूलमती वर्मा ने 85 मतों के अंतर से जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया। वे घुमका नगर पंचायत की पहली अध्यक्ष बनीं। हालांकि वार्ड स्तर पर भाजपा को बढ़त मिली, लेकिन अध्यक्ष पद कांग्रेस के खाते में चला गया।

इसके अलावा पलारी नगर पंचायत अध्यक्ष पद, चारामा वार्ड क्रमांक-13 और पखांजूर क्षेत्र में भी कांग्रेस ने जीत दर्ज कर अपनी उपस्थिति मजबूत की।

परिणामों पर सियासी बयानबाजी शुरू

उपचुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। कांग्रेस के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने कहा कि जनता का भरोसा भाजपा सरकार से लगातार कम हो रहा है और उपचुनाव के नतीजे इसी जनभावना का प्रतिबिंब हैं।

वहीं जगदलपुर के महापौर संजय पांडेय ने परिणामों को स्वीकार करते हुए कहा कि पार्टी हार के कारणों की समीक्षा करेगी और संगठनात्मक स्तर पर आवश्यक सुधार किए जाएंगे।

2028 की राजनीति का संकेत?

हालांकि ये उपचुनाव स्थानीय निकायों तक सीमित थे, लेकिन इनके परिणामों को आगामी राजनीतिक मुकाबलों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। कई सीटों पर कांग्रेस ने अपने परंपरागत गढ़ बचाए, जबकि भाजपा ने भी कई क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ की सियासत में मुकाबला अभी भी पूरी तरह खुला हुआ है और आने वाले चुनावों में दोनों दलों के बीच संघर्ष और दिलचस्प होने वाला है।

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