गजेंद्र साहू। चलिए ‘जीवन-मृत्यु’ की आँख मिचौली के बीच धरम जी ने सदैव के लिए अपनी ‘आँखे’ बंद कर ली। उनकी ‘यादों की बारात’ निकाली जाए तो बहुत लंबी है। ‘लाइफ इन मेट्रो’ में बिताने के बावजूद भी वे हमेशा गाँव की जड़ो से जुड़े रहे। उन्हें ‘जागीर’ में फ़िल्म दुनिया नहीं मिली बल्कि उन्होंने मेहनत, संघर्ष और जुनून से ‘अपने’ सपने को ‘हकीकत’ में बदला। उन्होने काम और ‘ग़ज़ब’ हैंडसम हंक पर्सनालिटी से बॉलीवुड में ‘तहलका’ मचा दिया और इस सिनेमा जगत में ‘हुकूमत’ की। वे बॉलीवुड के वो ‘जुगनू’ थे जिन्हें चमकने के लिए किसी ‘शोले’ की जरूरत नहीं पड़ी बल्कि वे अपनी ‘प्रतिज्ञा’ और काम के प्रति ‘धरम-वीर’ बनकर बॉलीवुड में अपना ‘लोहा’ मनवाया। उन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों में ‘आग ही आग’ लगा दी। वे चुपके-चुपके’ कई यादों और ‘दोस्त’ को पीछे छोड़कर दूर आसमान में ‘फ़रिश्ते’ के पास जा चुके हैं। अब हम उन्हें रुकने के लिए किसी ‘ड्रीम गर्ल’ के नाम से ‘ब्लैकमेल’ भी नहीं कर सकते।
उपरोक्त इंट्रोडक्शन में मैंने धरम जी के कुछ फ़िल्मों का सहारा लेकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने की कोशिश की है। वे एक महान कलाकार थे। उन्होंने सिनेमा जगत को बहुत कुछ दिया। धरम जी की फ़िल्में देखकर बड़े हुए है कारण मेरे पिताजी और चाचा जी धरम जी के बड़े प्रशंसक हैं।
मुझे याद है जब हम छोटे थे तब पिताजी धरम जी के फ़िल्मों की सीडी लाया करते थे। हम स्कूल जाने के लिए तैयार हुआ करते थे उसी वक्त चाचा जी हर रोज अपने काम में जाने के पहले दो फ़िल्में (अलग-अलग दिन) “शोले और समाधि” देखा करते थे। ख़ासकर पार्ट-1। पार्ट -1 मतलब सीडी का पहला भाग। शोले जो मनोरंजन से भरपूर है और समाधि जो बेहद भावात्मक कहानी पर आधारित है। “तुम्हारा नाम क्या बसंती ??” (अमिताभ द्वारा कहे जाने पर) के पहले ही हँसी का पल। “चुप बे दिनभर बक-बक करते रहता है।” (धरम जी द्वारा कहे जाने पर) फिर हँसी। जेल के सीन हो या सूरमा भोपाली। बसंती से फ़्लर्ट करना हो या गब्बर से फाइट। धरम जी के एक-एक सीन आज आँखो के सामने तैर रहे हैं।
आज सबसे अधिक वह सीन याद आ रहा है जब पानी की टंकी पर चढ़कर उन्होंने कहा था “इसलिए मरना कैंसिल”। काश उस दिन की तरह इस दिन भी आपका “मरना कैंसिल हो जाता।” अलविदा धरम जी।





