नेतन्याहू की कुर्सी पर संकट इजराइल में पीएम के सीधे चुनाव की तैयारी

यरुशलम। इजराइल में हालिया संसदीय चुनाव के बाद पैदा हुए राजनीतिक गतिरोध को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के विरोधी दल एक नया राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं। विपक्षी गठबंधन के कुछ नेता प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव की व्यवस्था दोबारा लागू करने के लिए विधेयक लाने पर विचार कर रहे हैं। इस प्रस्ताव के तहत जनता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव कर सकेगी और इसके लिए संसद के चुनाव से अलग मतदान कराया जा सकता है।इस पहल का मुख्य उद्देश्य ऐसी सरकार बनाने का रास्ता तलाशना है, जिसके लिए विपक्षी दलों को अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर न रहना पड़े। हालांकि, अभी यह केवल विचाराधीन प्रस्ताव है। विपक्षी दलों के बीच इस पर अंतिम सहमति नहीं बनी है और न ही विधेयक का कोई आधिकारिक मसौदा सार्वजनिक किया गया है।इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक गुट को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। इसी वजह से नई सरकार बनाने को लेकर बातचीत जटिल हो गई है। नेतन्याहू का गठबंधन हो या उनके विरोधी दल, दोनों के सामने 120 सदस्यीय नेसेट (इजराइली संसद) में बहुमत जुटाने की चुनौती है।

चुनाव के बाद किसी भी गुट को नहीं मिला बहुमत

इजराइल के चुनावी नतीजों ने देश की राजनीति को एक बार फिर अनिश्चितता में डाल दिया है। एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम नतीजों में प्रधानमंत्री नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि उनके विरोधी दलों के गठबंधन को 48 सीटें हासिल हुई हैं। वहीं, अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के हिस्से में 19 सीटें आई हैं।इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सदस्य होते हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में नेतन्याहू और उनके विरोधियों में से कोई भी गुट अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है।गणित के लिहाज से नेतन्याहू के विरोध में 67 सांसद हैं, लेकिन इन सभी को एक साथ लाना आसान नहीं है। विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान अरब पार्टियों के साथ गठबंधन या उनके समर्थन से सरकार बनाने पर आपत्ति जताई थी। अब यही राजनीतिक प्रतिबद्धताएं सरकार गठन के रास्ते में बाधा बन रही हैं।

प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव का क्या है प्रस्ताव?

विपक्षी खेमे में जिस प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है, उसके तहत प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे जनता के वोट से कराने की व्यवस्था वापस लाई जा सकती है। इसमें मतदाता संसद के सदस्यों के चुनाव से अलग प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए मतदान कर सकेंगे।इस व्यवस्था का संभावित लाभ यह होगा कि किसी उम्मीदवार को जनता से सीधे जनादेश मिलने के बाद सरकार बनाने का नया राजनीतिक रास्ता खुल सकता है। विपक्षी नेताओं को उम्मीद है कि इससे मौजूदा गठबंधन संबंधी मुश्किलों को दूर करने में मदद मिल सकती है।हालांकि, सीधे चुनाव में जीतने वाला प्रधानमंत्री संसद में बहुमत के बिना किस सीमा तक सरकार चला सकेगा, यह प्रस्तावित कानून की शर्तों पर निर्भर करेगा। मौजूदा व्यवस्था में किसी भी नई सरकार को नेसेट में विश्वास मत हासिल करना अनिवार्य है। इसके लिए 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।

नेतन्याहू भी पहले दे चुके हैं ऐसा प्रस्ताव

दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव का विचार नया नहीं है। बेंजामिन नेतन्याहू खुद वर्ष 2021 में इसी तरह का प्रस्ताव सामने रख चुके हैं। उस समय इजराइल में लगातार चुनाव होने के बावजूद कोई भी राजनीतिक दल स्थिर सरकार बनाने में सफल नहीं हो पा रहा था।अप्रैल 2021 में नेतन्याहू ने सुझाव दिया था कि संसद को भंग किए बिना प्रधानमंत्री का सीधा चुनाव कराया जाए। उनका मानना था कि इससे राजनीतिक गतिरोध खत्म करने और सरकार गठन की प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद मिलेगी।अब करीब पांच साल बाद नेतन्याहू को सत्ता से हटाने की कोशिश कर रहे विपक्षी दल उसी विचार को दोबारा सामने लाने पर विचार कर रहे हैं। राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और इस बार यह प्रस्ताव उनके विरोधी खेमे के लिए एक संभावित विकल्प बनकर उभरा है।

पहले भी इजराइल में हो चुका है प्रधानमंत्री का सीधा चुनाव इजराइल में प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव की व्यवस्था पहले भी लागू हो चुकी है। 1996 और 1999 के चुनावों में मतदाताओं को प्रधानमंत्री और संसद के लिए अलग-अलग वोट डालने का विकल्प दिया गया था।इसके बाद 2001 में प्रधानमंत्री पद के लिए अलग से विशेष चुनाव कराया गया था। उस चुनाव में एरियल शेरोन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री एहुद बराक को हराया था।हालांकि, इस व्यवस्था से राजनीतिक स्थिरता की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बाद में इसे समाप्त कर दिया गया और इजराइल फिर से संसदीय प्रणाली पर लौट आया। मौजूदा व्यवस्था में प्रधानमंत्री का चयन संसद में बहुमत के समर्थन के आधार पर होता है।इसलिए सीधे प्रधानमंत्री चुनाव की व्यवस्था बहाल करने के लिए केवल राजनीतिक घोषणा पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि मौजूदा बुनियादी कानून में बदलाव करना पड़ेगा।

 

 

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