- काछनगादी रस्म और पनका समाज की ऐतिहासिक परंपरा
जगदलपुर।विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की शुरुआत काछनगादी रस्म के साथ होती है, जिसमें पनका (पनिका) समाज की भूमिका सदियों से सर्वोपरि रही है। इस पारंपरिक रस्म के तहत पनका समाज की एक कुंवारी कन्या को बेल के कांटों से बने झूले पर बैठाया जाता है, जहां उस पर काछन देवी आरूढ़ होती हैं। इसके बाद बस्तर राजपरिवार और दशहरा समिति के सदस्य देवी स्वरूपा कन्या से बस्तर दशहरा पर्व को निर्विघ्न संपन्न कराने की अनुमति मांगते हैं। देवी से हरी झंडी मिलने के बाद ही इस ऐतिहासिक 75 दिवसीय उत्सव का आधिकारिक आगाज होता है। यह परंपरा बस्तर की सांस्कृतिक और सामाजिक समरसता का एक अभिन्न अंग है।
राष्ट्रपति प्रवास के दौरान उपजा मुख्य विवाद
इस वर्ष विवाद की मुख्य वजह भारत के राष्ट्रपति के जगदलपुर प्रवास के दौरान प्रोटोकॉल और पारंपरिक अनदेखी को माना जा रहा है। काछनगादी की मुख्य रस्म निभाने वाली पनका समाज की कन्या पीहू दास को राष्ट्रपति से मिलवाया जाना तय था। हालांकि, अंतिम समय पर पीहू दास के स्थान पर किसी अन्य कन्या को राष्ट्रपति से मिलवा दिया गया। समाज का आरोप है कि इस फेरबदल से न केवल उनकी सदियों पुरानी परंपरा का अपमान हुआ है, बल्कि देवी स्वरूपा कन्या और पूरे पनका समाज की धार्मिक आस्था को भी गहरी ठेस पहुंची है।
कलेक्ट्रेट घेराव और पांच सूत्रीय मांगों का ज्ञापन
प्रशासनिक उपेक्षा और समाज की नाराजगी को लेकर सोमवार को पनका समाज के सैकड़ों लोग एकजुट हुए। समाज के प्रतिनिधियों और आम लोगों ने अपनी आवाज बुलंद करते हुए जगदलपुर कलेक्ट्रेट का रुख किया। वहां उन्होंने शासन-प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए मुख्यमंत्री के नाम अपर कलेक्टर को एक पांच सूत्रीय ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन के माध्यम से समाज ने अपनी पारंपरिक भूमिका को अक्षुण्ण रखने, भविष्य में ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति न होने और समाज के संवैधानिक व पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण की मांग की है।
समाज की दो टूक और भविष्य की चेतावनी
पनका समाज के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि बस्तर दशहरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय और स्थानीय समाजों की आस्था का केंद्र है। यदि उनकी पांच सूत्रीय मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया और परंपराओं के साथ खिलवाड़ करने वाले जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो समाज आगे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगा। समाज ने साफ कहा है कि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत और सम्मान के साथ किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेंगे।







