सच्ची कहानी : माउंट एवरेस्ट की सबसे दर्दनाक प्रेम कहानी: फ्रांसिस और सर्जेई आर्सेंटिएव

यह वो कहानी है जो पर्वतारोहण के इतिहास में दिल को चीर जाती है। अमेरिकी महिला फ्रांसिस आर्सेंटिएव (जन्म 18 जनवरी 1958) और उनके रूसी पति सर्जेई आर्सेंटिएव (जिन्हें “स्नो लेपर्ड” के नाम से जाना जाता था, क्योंकि उन्होंने रूस की पाँच सबसे ऊँची चोटियों पर चढ़ाई की थी) दोनों पहाड़ों के दीवाने थे। 1992 में शादी के बाद दोनों ने कई मुश्किल चोटियों को एक साथ फतह किया था। लेकिन मई 1998 में उन्होंने सबसे खतरनाक चुनौती ली, माउंट एवरेस्ट (8,848 मीटर) पर बिना किसी सप्लीमेंटल ऑक्सीजन के चढ़ना।

उस समय फ्रांसिस 40 साल की थीं। उनका लक्ष्य था, अमेरिका की पहली महिला बनकर एवरेस्ट को बिना ऑक्सीजन के जीतना। मौसम की मार और देरी के कारण उनका अभियान कई बार रुका। वे डेथ ज़ोन (8,000 मीटर से ऊपर) में कई रातें बिना टेंट, बिना गर्म खाने और बिना ऑक्सीजन के बिताने को मजबूर हुए। थकान चरम पर थी, लेकिन प्यार और जुनून उन्हें आगे बढ़ाए जा रहा था।

22 मई 1998 को देर शाम दोनों शिखर पर पहुँचे। फ्रांसिस आर्सेंटिएव इतिहास रच चुकी थीं, बिना ऑक्सीजन के एवरेस्ट फतह करने वाली पहली अमेरिकी महिला। लेकिन खुशी पल भर की ही थी। अंधेरे में, भयंकर ठंड और हवा में उतरते वक्त दोनों एक-दूसरे से बिछड़ गए। सर्जेई नीचे कैंप IV तक पहुँच गए, यह सोचकर कि उनकी पत्नी पीछे-पीछे आ रही होगी। लेकिन फ्रांसिस कहीं गायब थीं।

अगली सुबह उज्बेक पर्वतारोहियों की टीम ने 8,600 मीटर की ऊँचाई पर फ्रांसिस को पाया। वे बर्फ पर लेटी हुईं, आधी बेहोश, गंभीर फ्रॉस्टबाइट और हाइपोक्सिया (ऑक्सीजन की कमी) से जूझ रही थीं। उन्होंने कुछ मदद की, ऑक्सीजन मास्क दिया, मालिश की, लेकिन उन्हें नीचे ले जाना असंभव था। हर कोई जानता था कि एक व्यक्ति को बचाने के चक्कर में पूरी टीम की जान जा सकती है।

फ्रांसिस अभी भी जिंदा थीं। उनके होठों से निकले शब्द आज भी सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं,  (“मुझे मत छोड़ो… कृपया मुझे मत छोड़ो।”) कैथी ओ’डाउड समेत कई टीमों ने उन्हें देखा, मदद की, लेकिन आगे बढ़ गए।

जब सर्जेई को पता चला कि उनकी पत्नी ऊपर फँसी हुई है, तो उन्होंने बिना सोचे-समझे ऑक्सीजन सिलिंडर उठाए और मौत के मुहाने पर दोबारा चढ़ाई शुरू कर दी। प्यार उन्हें दीवाना बना चुका था। लेकिन वे कभी वापस नहीं लौटे। कोहरा छा गया और सर्जेई गायब हो गए। बाद में 1999 में उनके शरीर के अवशेष नीचे मिले, उन्होंने बचाने की कोशिश में गिरकर जान गँवाई थी।

फ्रांसिस 23-24 मई 1998 को चल बसीं। उनकी लाश चमकीले बैंगनी जैकेट में मुख्य रास्ते के पास ही पड़ी रही, शांत, नींद में सोई हुई जैसी। पर्वतारोही उन्हें “एवरेस्ट की स्लीपिंग ब्यूटी” कहने लगे। नौ साल तक (2007 तक) हर चढ़ने वाला उनके पास से गुजरता, दिल थामकर।

आखिरकार 2007 में ब्रिटिश पर्वतारोही इयान वुडॉल (जिन्होंने 1998 में भी उन्हें बचाने की कोशिश की थी) शेरपाओं की मदद से वापस आए। उन्होंने फ्रांसिस के शरीर को अमेरिकी झंडे में लपेटा और सम्मान के साथ रास्ते से हटाकर नीचे खाई में सुला दिया, ताकि वे अब शांति से आराम कर सकें।

यह कहानी सिर्फ मौत की नहीं, बल्कि असीम प्यार, जुनून और पहाड़ों की क्रूरता की है। फ्रांसिस के बेटे पॉल डिस्टेफानो (पहले विवाह से) उस समय सिर्फ 11 साल के थे। एक तरफ माँ का सपना, दूसरी तरफ परिवार… और बीच में एवरेस्ट की बर्फीली मौत।पहाड़ बुलाते हैं, लेकिन हमेशा लौटने नहीं देते।

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