बिलासपुर।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने और लगातार प्रताड़ित करने के एक गंभीर मामले में डॉक्टर पति को कसूरवार पाते हुए तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया कि पति के अवैध संबंधों और उसके द्वारा दी जा रही असहनीय शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना के चलते ही मृतका को यह खौफनाक कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। अदालत ने इस मामले में उपलब्ध तमाम साक्ष्यों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से बच्चों के बयानों को फैसले का मुख्य आधार बनाया है।
अवैध संबंध और लगातार प्रताड़ना बनी खुदकुशी की वजह
अदालती कार्यवाही और जांच के दौरान यह बात पूरी तरह साबित हुई कि डॉक्टर पति के अपनी ही क्लीनिक में काम करने वाली एक नर्स के साथ अवैध संबंध थे। जब भी पत्नी द्वारा इस अनैतिक रिश्ते का विरोध किया जाता था, तो डॉक्टर उसके साथ बर्बरतापूर्वक मारपीट करता था और उसे मानसिक रूप से तोड़ता था। कोर्ट ने माना कि यह प्रताड़ना इस हद तक बढ़ चुकी थी कि मृतका के पास अपनी जीवनलीला समाप्त करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था।
मासूम बच्चों के बयानों ने खोली पिता के जुल्मों की पोल
इस पूरे मामले में डॉक्टर के ही बेटा-बेटी की गवाही अभियोजन पक्ष के लिए सबसे बड़ा हथियार साबित हुई। बच्चों ने अदालत के सामने रोते हुए अपने पिता के क्रूर चेहरे का पर्दाफाश किया। उन्होंने बताया कि किस तरह उनके पिता ने मां को बेरहमी से पीटा था, उन्हें घर से निकाल देने और तलाक की धमकियां दी थीं, तथा एक बार पानी में नींद की गोलियां मिलाकर पिलाने की कोशिश भी की थी। बच्चों की इस मर्मस्पर्शी और सच्ची गवाही को अदालत ने अटूट साक्ष्य माना।
जेल में बिताई अवधि सजा में होगी कम, कोर्ट ने दिया सरेंडर का आदेश
दोषी डॉक्टर इस मामले के दौरान पहले ही एक साल, दो महीने और चौदह दिन की अवधि जेल की सलाखों के पीछे काट चुका है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उदारता दिखाते हुए इस समय को उसकी कुल तीन साल की सजा में समायोजित करने की मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही, अदालत ने डॉक्टर को अपनी शेष बची हुई सजा भुगतने के लिए आगामी 10 दिसंबर 2026 तक हर हाल में ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का कड़ा निर्देश जारी किया है।
बचाव पक्ष की उम्र और पारिवारिक जिम्मेदारी की दलीलें खारिज
सुनवाई के आखिरी दौर में चिकित्सक के अधिवक्ता ने अदालत से सजा में नरमी बरतने की गुहार लगाई थी। उन्होंने दलील दी थी कि डॉक्टर की उम्र लगभग 50 वर्ष हो चुकी है और पूरे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर टिकी है। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपराध की संगीनता और एक महिला के जीवन की कीमत को सर्वोपरि रखते हुए बचाव पक्ष के इन तमाम तर्कों को दरकिनार कर दिया और कठोर सजा का फैसला बरकरार रखा।







