बाढ़ का नाम सुनते ही दिमाग में एक तस्वीर बनती है। काले बादल, तेज बारिश और उफनती नदी। लेकिन नेपाल में बुधवार को जो हुआ, उसकी कहानी थोड़ी अलग है। रसुवा जिले में अचानक पानी आया। भोटेकोशी नदी देखते ही देखते विकराल हो गई। सड़कें और पुल इसकी चपेट में आ गए। गाड़ियां और घर बह गए। कई जगहों पर मलबा भर गया। सबसे हैरानी की बात यह थी कि जिस इलाके में तबाही हुई, वहां उस वक्त वैसी भारी बारिश नहीं हो रही थी।
तो फिर इतना पानी आया कहां से?
यहीं से हिमालय की असली कहानी शुरू होती है। शुरुआती आकलन में आशंका है कि ऊपर पहाड़ से बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा टूटकर ल्हेंडे नदी में गिरा। इससे नदी का रास्ता कुछ समय के लिए बंद हो गया। पानी पीछे जमा होता गया। फिर जब यह प्राकृतिक रुकावट टूटी तो जमा पानी अचानक नीचे दौड़ पड़ा। यही फ्लैश फ्लड का सबसे खतरनाक रूप है।
इसे ऐसे समझिए। पहाड़ ने कुछ देर के लिए नदी पर बांध बना दिया। फिर वही बांध टूट गया। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बांध को इंसानों ने नहीं बनाया था। कहानी में एक और कड़ी है। उसी समय इलाके में 4.4 तीव्रता का भूकंप भी दर्ज हुआ था। शुरुआती आशंका है कि इससे बर्फ और चट्टानों का एवलांच ट्रिगर हुआ हो सकता है।
लेकिन क्या ऐसी घटना पहली बार हुई है? बिल्कुल नहीं।
2021 में उत्तराखंड की ऋषिगंगा घाटी में जो हुआ, उसने भी वैज्ञानिकों को चौंका दिया था। वहां पहाड़ के ऊपरी हिस्से से विशाल मात्रा में बर्फ और चट्टान नीचे गिरी। इस रॉक-आइस एवलांच ने नदी में अचानक पानी और मलबे का सैलाब पैदा कर दिया। कुछ ही समय में ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में भारी तबाही मच गई। लोग समझ ही नहीं पाए कि पहाड़ से आखिर आया क्या है।2013 की केदारनाथ आपदा में भी कहानी सिर्फ बारिश की नहीं थी। भारी बारिश और बादल फटने के साथ चोराबाड़ी झील के टूटने से अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे आया। मंदाकिनी घाटी में तबाही फैल गई। उस घटना ने एक बात साफ कर दी थी। पहाड़ों में पानी जितना खतरनाक है, उससे ज्यादा खतरनाक उसका अचानक जमा होकर एक साथ नीचे आना है।
अब जरा उस चीज की कल्पना कीजिए जो पहाड़ों में हजारों मीटर ऊपर मौजूद है। ग्लेशियर। इनके आसपास कई छोटी-बड़ी झीलें बनती रहती हैं। ग्लेशियर पीछे हटता है तो उसके सामने पानी जमा हो सकता है। कई बार बर्फ, चट्टान और मलबा ही उस झील की प्राकृतिक दीवार बन जाते हैं। ऊपर से सब शांत दिखाई देता है। नीचे बैठे लोगों को शायद पता भी नहीं होता कि उनके सिर के ऊपर एक विशाल पानी का टैंक बना हुआ है।
फिर किसी दिन वह दीवार टूट जाए तो? और इसमें सबसे डरावनी चीज बारिश नहीं है। समय है। सामान्य बाढ़ में पानी बढ़ता है। लोग देखते हैं। खबर मिलती है। सामान ऊपर रखा जाता है। लोग घर छोड़ते हैं। लेकिन फ्लैश फ्लड में कई बार पानी इतना तेजी से आता है कि चेतावनी और तबाही के बीच बहुत कम समय बचता है। यही वजह है कि पहाड़ों में रहने वालों के लिए नदी सिर्फ नदी नहीं होती। वह ऊपर से आने वाले हर बदलाव का रास्ता भी है।
इसका एक दूसरा चेहरा भारत ने 1979 में मोरबी में देखा था। वहां मच्छु-II बांध टूट गया था। यह प्राकृतिक बाढ़ नहीं थी। यह इंसानों का बनाया बांध था, जो टूटकर खुद बाढ़ का कारण बन गया। कुछ ही समय में पानी मोरबी में घुस गया और हजारों लोगों की जान चली गई। उस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया था। आपदा सिर्फ प्रकृति पैदा करती है या हमारी बनाई व्यवस्था भी कभी-कभी उसे कई गुना बड़ा कर देती है?
यानी बाढ़ की भी कई शक्लें हैं। कहीं बारिश वजह है। कहीं बादल फटते हैं। कहीं ग्लेशियल झील टूटती है। कहीं पहाड़ नदी में गिर जाता है। कहीं बांध टूट जाता है। और कभी-कभी इनमें से दो-तीन चीजें एक साथ हो जाती हैं। नीचे रहने वाले इंसान को इन सबका पता तब चलता है, जब पानी उसके सामने पहुंच जाता है। और हिमालय में यही सबसे बड़ी चुनौती है।
नेपाल की घटना का असर इसलिए भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भोटेकोशी आगे चलकर त्रिशूली नदी तंत्र से जुड़ती है और यह पूरा जल तंत्र भारत के गंडक बेसिन से जुड़ा है। इसलिए नेपाल के पहाड़ों में अचानक आई बड़ी बाढ़ का असर नीचे भारतीय मैदानों तक पहुंच सकता है। बिहार और उत्तर प्रदेश में इसी वजह से सतर्कता बढ़ाई गई है।














