Raksha bandhan kahani: रक्षा बंधन का त्योहार हर भाई-बहन के लिए खास होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रक्षा बंधन की शुरुआत से जुड़ी क्या कहानी है। यहां पढ़ें रक्षा बंधन की कथा।
raksha bandhan kahani in hindi
रक्षा बंधन से जुड़ी कहानी
Raksha bandhan katha in hindi: हर साल सावन पूर्णिमा पर रक्षा बंधन या राखी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार रक्षा बंधन 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को है। यह मुख्य रूप से भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह क साथ रक्षा के संकल्प का पर्व है। रक्षा बंधन का अर्थ है- सुरक्षा का धागा। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र या राखी बांधकर उनकी लंबी आयु के साथ सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करती हैं। भाई भी अपनी बहन को हर परिस्थिति में रक्षा करने का वचन देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रक्षा बंधन का त्योहार क्यों मनाया जाता है और कैसे इस पर्व की शुरुआत हुई थी। यहां पढ़ें रक्षा बंधन के पर्व से जुड़ी पौराणिक कथाएं।
माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है कहानी:
रक्षा बंधन से जुड़ी एक कथा का संबंध माता लक्ष्मी और राजा बलि से है। कथा के अनुसार, एक बार राजा बलि ने भगवान विष्णु को पाताल लोक का द्वारपाल बना लिया था। भगवान विष्णु के पाताल लोक चले जाने से मां लक्ष्मी अत्यंत परेशान हो गईं। नारद जी की सलाह पर अपने पति को वापस वैकुंठ लोक लाने के लिए मां लक्ष्मी ने एक गरीब स्त्री का रूप धारण किया और पाताल लोक गईं। राजा बलि की कलाई पर मां लक्ष्मी ने रक्षासूत्र (राखी) बांधा। तब राजा बलि ने मां लक्ष्मी से उपहार मांगने के लिए कहा तो वह अपने असली रूप में आकर भगवान विष्णु को मांगा था।
तब राजा बलि ने अपनी बहन मां लक्ष्मी को दिए वचन के अनुसार भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ लोक जाने की अनुमति दी थी। शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन यह घटना हुई उस दिन सावन माह की पूर्णिमा थी। ऐसी मान्यता है कि तभी से रक्षा बंधन के त्योहार की शुरुआत हुई थी।
भगवान कृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी कथा:
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था। तब उनकी उंगली पर चोट आ गई और खूब बहने लगा था। यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर भगवान कृष्ण की उंगली पर बांधा था, ताकि खूब का बहना बंद हो जाए। द्रौपदी के प्रेम और सेवा भाव से भगवान कृष्ण प्रसन्न हुए और उनकी हर परिस्थिति में रक्षा का वचन दिया था। इसके बाद कौरवों की सभा में चीरहरण के समय भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाकर भाई होने का फर्ज निभाया था।
यमराज और यमुना से जुड़ी है पौराणिक कहानी:
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, यमराज और उसकी बहन काफी समय से एक-दूसरे से मिल नहीं सके थे। इसके बाद यमुना जी ने अपने भाई यमराज को घर भोजन पर बुलाया। यमराज ने बहन का आमंत्रण स्वीकार किया और अपनी बहन के घर पहुंचे। यमुना जी ने अपने भाई का स्वागत और आदर-सम्मान किया। अपने भाई के मस्तक पर यमुना ने तिलक लगाया और हाथ पर रक्षासूत्र बांधा था। बहन के आदर भाव को देखकर यमराज ने यमुना से वर मांगने के लिए कहा। तब यमुना जी ने कहा वह हर वर्ष इस दिन उनसे मिलने आएं। जिस दिन यमराज अपनी बहन से मिलने पहुंचे उस दिन सावन पूर्णिमा थी। यमुना जी ने कहा कि जो भी बहन इस दिन अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधे उसे भय से मुक्ति प्राप्त मिले। मान्यता है कि तभी से इस पर्व की शुरुआत हुई थी।
इंद्राणी और देवराज इंद्र की कथा
भविष्य पुराण के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के युद्ध में देवता हारने लगे, उस समय इंद्राणी (शची) ने देवगुरु बृहस्पति की सलाह पर सावन पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा। मान्यता है कि इस रक्षा सूत्र के प्रभाव से देवताओं और इंद्र देव की विजय हुई थी।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।














