सरगुजा। सरगुजा अंचल के माटीपुत्र कहे जाने वाले नेता, पूर्व विधायक भानु प्रताप सिंह मझवार गांव पहुंचकर जो देखा और ग्रामीणों से जो सुना, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर विकास किसके लिए और किस कीमत पर?
ग्रामीणों ने बताया कि 12 महीने में लगभग 8 महीने उनका जीवन जंगल के साथ ही बीतता है। यही जंगल उन्हें महुआ, चिरौंजी और अन्य वन उपज देता है। यही जंगल उनके जीवन, संस्कृति, परंपरा और पहचान का आधार है।
उन्होंने कहा:
“हमें हमारे जंगल, घर, संस्कृति, परंपरा और पहचान से बेदखल कर दिया जाएगा तो हम कैसे खुशहाल रहेंगे? यह ऐसा है जैसे किसी बच्चे को उसकी मां से अलग कर देना। मां भी अपने बच्चे के बिना नहीं रह सकती और बच्चा भी अपनी मां के बिना नहीं रह सकता।”
यह सिर्फ जमीन का सवाल नहीं है।
यह जल, जंगल, जमीन, आजीविका, संस्कृति और अस्तित्व का सवाल है।
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि कंपनियों की ओर से लगातार दबाव और हस्ताक्षर करने के लिए परेशान किए जाने की बात सामने आ रही है। उनका कहना है कि वे न चैन से सो पा रहे हैं और न ही सामान्य रूप से अपना काम कर पा रहे हैं।
और दूसरी तरफ विकास का दावा किया जा रहा है।
ग्रामीणों का सवाल है कि पिछले दो महीनों में केवल दो बार बिजली देखी है। जिस सोलर बिजली को निःशुल्क बताया गया था, उस पर भी रोक लगाए जाने की बात ग्रामीणों ने कही। गांव में नेटवर्क की समस्या है, डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं और आपात स्थिति में समय पर मदद मिलना भी मुश्किल है।
जब बुनियादी सुविधाएं तक नहीं पहुंचीं, तो जंगल और जमीन छीनकर आखिर कैसा विकास किया जा रहा है?
अब सवाल सरकार से है…
हसदेव अरण्य क्षेत्र में आदिवासी समुदायों के अधिकारों और ग्राम सभा की भूमिका को नजरअंदाज करके कोई भी फैसला कैसे लिया जा सकता है?
PESA कानून अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को परंपराओं, संस्कृति और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा के साथ-साथ लघु वनोपज पर अधिकार और भूमि अधिग्रहण जैसे मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका देता है।
वहीं वन अधिकार कानून, 2006 मूलवासी आदिवासी समुदायों के आजीविका, निवास और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन से जुड़े वन अधिकारों को मान्यता देता है तथा ग्राम सभा को वन अधिकारों की प्रक्रिया और जंगलों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका देता है।
इसलिए सवाल सीधा है:
क्या प्रभावित ग्राम सभाओं के वन अधिकारों का विधिवत निपटारा हुआ है?
क्या ग्राम सभाओं की वास्तविक और स्वतंत्र भागीदारी तथा आवश्यक सहमति/परामर्श की प्रक्रिया पूरी हुई है?
क्या ग्रामीणों को परियोजना, विस्थापन, पुनर्वास और उनके अधिकारों की पूरी जानकारी देकर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अवसर मिला है?
और सबसे बड़ा सवाल…
तारा कोल ब्लॉक को दोबारा व्यावसायिक नीलामी के लिए रास्ता किसने खोला?
कोयला मंत्रालय के 11 सितंबर 2026 के आधिकारिक स्पष्टीकरण के अनुसार, 2023 में तारा कोल ब्लॉक को व्यावसायिक नीलामी से बाहर किया गया था। मंत्रालय के अनुसार, 11 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र को पत्र लिखकर तारा कोल ब्लॉक को आगामी नीलामी में शामिल करने का अनुरोध किया, यह कहते हुए कि ब्लॉक लेमरू एलीफेंट कॉरिडोर से बाहर है। इसके बाद संशोधित सीमा के साथ तारा कोल ब्लॉक को 15वें दौर की व्यावसायिक नीलामी में रखा गया और नीलामी हुई।
तो सरकार से हमारा सवाल है:
2023 में जिस क्षेत्र को लेकर पर्यावरण और हसदेव अरण्य की चिंता के कारण तारा को नीलामी से बाहर किया गया था, उसी तारा को 2025 में दोबारा नीलामी के लिए आगे बढ़ाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
क्या इस निर्णय से पहले प्रभावित ग्राम सभाओं की आवाज सुनी गई?
क्या PESA और वन अधिकार कानून के तहत ग्रामीणों के अधिकारों की पूरी तरह जांच और संरक्षण सुनिश्चित किया गया?
और अगर ग्रामीण आज भी कह रहे हैं कि:
“हमें हमारे जंगल के साथ ही रहने दीजिए, हम अपने जल, जंगल और जमीन के साथ खुशहाल हैं…”
तो फिर उनकी आवाज सरकार तक क्यों नहीं पहुंच रही?
हम सरकार और खदान कंपनियों से कहना चाहते हैं:
हमें हमारी मां से अलग मत कीजिए।
हसदेव का जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं है।
यह आदिवासी समाज की जिंदगी है, उसकी आजीविका है, उसकी संस्कृति है, उसकी परंपरा है और उसकी पहचान है।
विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो किसी समुदाय से उसका अस्तित्व ही छीन ले।








