सरकारी सिस्टम की लापरवाही से अभ्यर्थियों को भारी नुकसान: मानसिक तनाव, आर्थिक चोट और उम्र सीमा निकलने का डर

  • छत्तीसगढ़ शिक्षक भर्ती परीक्षा पर हाईकोर्ट की रोक: नियमों की अनदेखी पड़ी भारी, दांव पर लगा लाखों युवाओं का भविष्य

छत्तीसगढ़ शिक्षक भर्ती परीक्षा स्थगित होने से प्रदेश के लाखों अभ्यर्थियों को बहुआयामी नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिसकी भरपाई कर पाना किसी भी स्तर पर संभव नहीं है। परीक्षा के ठीक पहले इस तरह की रोक लगने से सबसे बड़ा आघात अभ्यर्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर लगा है। पिछले कई महीनों से, और कुछ अभ्यर्थी तो सालों से, सामाजिक मेलजोल छोड़कर चौबीसों घंटे पढ़ाई में डूबे हुए थे। लगातार परीक्षा की तारीख नजदीक आने का दबाव और फिर अचानक परीक्षा टलने की खबर ने युवाओं को गहरे अवसाद और निराशा में धकेल दिया है। अनिश्चितता के इस माहौल में पढ़ाई की निरंतरता (रिदम) पूरी तरह टूट जाती है, जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं का मनोबल जमींदोज हो जाता है।

इस प्रशासनिक लापरवाही ने अभ्यर्थियों की कमर आर्थिक रूप से भी तोड़ दी है। प्रदेश के ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों से आने वाले हजारों युवाओं ने बिलासपुर, रायपुर और दुर्ग जैसे बड़े शहरों में किराए के कमरे या हॉस्टल लेकर कोचिंग की थी। हर महीने पांच से दस हजार रुपये का खर्च उठाने के लिए कई परिवारों ने कर्ज तक ले रखा था। इसके अलावा, जिन अभ्यर्थियों के परीक्षा केंद्र उनके गृह जिलों से दूर थे, उन्होंने आने-जाने के लिए ट्रेनों और बसों में एडवांस बुकिंग करा ली थी, जिसका पैसा अब पूरी तरह डूब चुका है। महंगी किताबों, टेस्ट सीरीज और फॉर्म भरने की फीस के रूप में अपनी जमा-पूंजी लगा चुके इन बेरोजगार युवाओं के सामने अब शहरों में टिके रहने या वापस गांव लौटने की बड़ी आर्थिक दुविधा खड़ी हो गई है।

सबसे गंभीर और अपूरणीय क्षति उन अभ्यर्थियों को हो रही है जो उम्र सीमा (एज लिमिट) के आखिरी पड़ाव पर हैं। सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रियाएं पहले ही कई-कई साल की देरी से चलती हैं। ऐसे में परीक्षा स्थगित होने और मामला कोर्ट-कचहरी में खिंचने के कारण भर्ती पूरी होने में महीनों या सालों का समय लग सकता है। इस लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान कई होनहार अभ्यर्थी तय अधिकतम आयु सीमा को पार कर जाएंगे, जिससे वे भविष्य में आने वाली अन्य सरकारी भर्तियों के लिए भी अयोग्य हो जाएंगे। अधिकारियों की एक छोटी सी तकनीकी गलती ने इन युवाओं के जीवन का सबसे कीमती समय और सरकारी शिक्षक बनने का आखिरी मौका भी दांव पर लगा दिया है।

इस पूरे प्रशासनिक विवाद और परीक्षा स्थगित होने के पीछे विज्ञापन तैयार करने वाले अधिकारियों की घोर लापरवाही सामने आई है। याचिकाकर्ताओं ने अधिवक्ता रूंगटा के माध्यम से न्यायालय को बताया कि राज्य सरकार द्वारा जारी भर्ती विज्ञापन में सामान्य प्रशासन विभाग और समाज कल्याण विभाग के तय दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन किया गया है। विज्ञापन में विभिन्न श्रेणी के दिव्यांगों को तो आरक्षण दिया गया, लेकिन पूरी तरह से दृष्टिबाधित (कमप्लीटली विजुअली इम्पेयर्ड) अभ्यर्थियों को इस लाभ से पूरी तरह वंचित कर दिया गया। याचिका में दलील दी गई कि आरक्षण रोस्टर में की गई इस बड़ी गड़बड़ी के कारण दृष्टिबाधित युवाओं के आवेदन करने और सरकारी नौकरी पाने के संवैधानिक अधिकारों का हनन हुआ है। अधिकारियों द्वारा नियमों को दरकिनार कर आनन-फानन में त्रुटिपूर्ण विज्ञापन जारी करने का खामियाजा अब प्रदेश के लाखों निर्दोष परीक्षार्थियों को भुगतना पड़ रहा है।

अधिकारियों की इस लचर कार्यप्रणाली के कारण एक बार फिर प्रदेश के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ होने जैसी स्थिति बन गई है। परीक्षा टलने से अभ्यर्थियों के सामने अनिश्चितता का गहरा संकट खड़ा हो गया है। कई युवा दूर-दराज के जिलों से परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने के लिए निकल चुके थे, तो कई अपनी जमा-पूंजी कोचिंग और किताबों पर फूंक चुके हैं। बार-बार भर्ती प्रक्रियाओं का कानूनी विवादों में फंसना युवाओं के मानसिक और आर्थिक मनोबल को तोड़ता है। अब इस पूरी भर्ती का भविष्य पूरी तरह से राज्य शासन द्वारा हाईकोर्ट में पेश किए जाने वाले जवाब और अदालत के अंतिम फैसले पर टिक गया है। यदि विभाग ने पहले ही नियमों का सही ढंग से पालन कर आरक्षण रोस्टर बनाया होता, तो आज न तो यह मामला अदालत पहुंचता और न ही परीक्षा पर रोक लगाने की नौबत आती।

 

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