लखनपुर में परंपरा के अनुसार एक दिन बाद मना दशहरा, कैबिनेट मंत्री राजेश अग्रवाल ने किया रावण दहन

जियाउल खान ,लखनपुर/सरगुजा ।


  • 1974 में छोटे स्तर पर शुरू हुआ था रावण दहन, 1990 से दशहरा सेवा समिति करा रही भव्य आयोजन; 3D आतिशबाजी बनी आकर्षण का केंद्र

लखनपुर। बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक विजयादशमी का पर्व लखनपुर में अपनी विशिष्ट परंपरा के अनुसार एक दिन बाद हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सरगुजा रियासत और यहां के ऐतिहासिक गढ़ से जुड़ी दशहरे की यह परंपरा आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है। बुधवार को लखनपुर के साक्षरता मिनी स्टेडियम में आयोजित भव्य दशहरा समारोह में छत्तीसगढ़ शासन के कैबिनेट मंत्री राजेश अग्रवाल ने रावण दहन किया। इस दौरान आकर्षक आतिशबाजी और विशेष रूप से तैयार की गई 3D आतिशबाजी ने लोगों का मन मोह लिया। रावण दहन देखने के लिए बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी मिनी स्टेडियम पहुंचे।

कैबिनेट मंत्री ने किया रावण दहन, 3D आतिशबाजी ने मोहा मन

साक्षरता मिनी स्टेडियम में आयोजित दशहरा समारोह में कैबिनेट मंत्री राजेश अग्रवाल ने रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया। रावण का पुतला धू-धूकर जलते ही पूरा मैदान जयकारों और तालियों से गूंज उठा। रंग-बिरंगी आतिशबाजी और 3D आतिशबाजी के विशेष प्रदर्शन ने आयोजन को और आकर्षक बना दिया। बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों में पर्व को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला।

कार्यक्रम में विधायक प्रबोध मिंज सहित नरेंद्र पांडे, सुरेश साहू, कृपा शंकर गुप्ता, राकेश अग्रवाल, अरविंद अग्रवाल, राजेंद्र अग्रवाल, दिनेश साहू और राकेश साहू समेत अन्य जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।

1974 में छोटे स्तर पर हुई थी शुरुआत, 1990 से आयोजन ने पकड़ी भव्यता

लखनपुर में साक्षरता मिनी स्टेडियम में रावण दहन की शुरुआत लगभग वर्ष 1974 में छोटे स्तर पर हुई थी। धीरे-धीरे यह आयोजन क्षेत्र के प्रमुख सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल हो गया। वर्ष 1990 से दशहरा सेवा समिति के माध्यम से रावण दहन कार्यक्रम को व्यवस्थित और भव्य स्वरूप दिया जाने लगा। समिति के अध्यक्ष राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में आयोजन की परंपरा आगे बढ़ती रही।

समय के साथ आयोजन में आधुनिक तकनीक और आकर्षक आतिशबाजी का समावेश हुआ। इस वर्ष 3D आतिशबाजी विशेष आकर्षण रही। दशकों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों को एक साथ लाने और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का माध्यम बनी हुई है।

राजपरिवार और ऐतिहासिक गढ़ से जुड़ी है एक दिन बाद दशहरा मनाने की परंपरा

अंबिकापुर से लगभग 20 से 25 किलोमीटर दूर स्थित लखनपुर का इतिहास सरगुजा रियासत और यहां के राजपरिवार से जुड़ा रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पूर्व में सरगुजा महाराजा की उपस्थिति में अंबिकापुर में दशहरे का भव्य आयोजन होता था। लखनपुर सहित रियासत के विभिन्न क्षेत्रों के राजपरिवारों के सदस्य इस अवसर पर महाराजा से मुलाकात करने और उत्सव में शामिल होने पहुंचते थे। इसी ऐतिहासिक परंपरा को लखनपुर में एक दिन बाद दशहरा मनाए जाने की वजहों में से एक माना जाता है।

एक अन्य स्थानीय मान्यता तत्कालीन शासक लाल बहादुर माहेश्वरी सिंहदेव के निधन से जुड़ी बताई जाती है। कहा जाता है कि दशहरे के दिन उनके निधन के बाद राजपरिवार में शोक के चलते अगले दिन पर्व मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। हालांकि, इन मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए पुराने राजकीय अभिलेखों का अध्ययन आवश्यक है।

स्थानीय जानकारी के अनुसार, बाजारपारा में वर्ष 1944 से दुर्गा प्रतिमा स्थापित कर दशहरा मनाने की परंपरा भी चली आ रही है। राजतंत्र समाप्त होने और समय बदलने के बावजूद लखनपुर के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को आज भी आस्था और उत्साह के साथ संजोए हुए हैं।

गढ़ के सामने लगता था दशहरा मेला, आज भी कायम है ऐतिहासिक जुड़ाव

लखनपुर का पुराना गढ़ यहां के गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले गढ़ के सामने दशहरे का मेला लगता था, जिसमें आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल होते थे। राजपरिवार के सदस्य लोगों से मुलाकात करते और उत्सव में सहभागिता निभाते थे। समय के साथ मेले का स्वरूप बदला और पुरानी रौनक में कमी आई, लेकिन इस परंपरा से जुड़ा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व आज भी कायम है।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के दौरान पैलेस के सामने पहुंचने पर राजपरिवार के सदस्यों द्वारा पूजा-अर्चना और लोगों को दशहरे की शुभकामनाएं देने की परंपरा भी इस ऐतिहासिक जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है।

परंपरा, आस्था और आधुनिकता का संगम बना लखनपुर का दशहरा

लखनपुर का दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास, राजपरिवार की विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है। वर्ष 1974 में छोटे स्तर पर शुरू हुआ रावण दहन आज भव्य आयोजन का रूप ले चुका है। आधुनिक तकनीक और 3D आतिशबाजी ने इसमें नया आकर्षण जोड़ा है, वहीं एक दिन बाद दशहरा मनाने की परंपरा लखनपुर को अलग पहचान देती है।

बदलते समय के बीच लखनपुरवासियों ने अपनी इस विशिष्ट परंपरा को जीवंत रखा है। यही वजह है कि हर वर्ष दशहरा सामाजिक एकजुटता, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक गौरव का अवसर बनकर सामने आता है।

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