दिवाली पर सुआ नृत्य की धूम, घर-घर पहुंच रहीं बालिकाओं और महिलाओं की टोलियां

भाटापारा। दीपावली पर्व के साथ ही शहर और ग्रामीण अंचलों में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला सुआ नृत्य की धूम मची हुई है। बालिकाओं और महिलाओं की टोलियां सुबह से देर शाम तक घर-घर पहुंचकर पारंपरिक गीतों के साथ सुआ नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दे रही हैं। इससे गांवों और शहर में दीपावली का उत्साह और रौनक बढ़ गई है। खास बात यह है कि नई पीढ़ी की बालिकाएं भी पूरे उत्साह के साथ इस लोकपरंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

सुआ नृत्य में महिलाएं और बालिकाएं बीच में सुआ रखकर उसके चारों ओर गोल घेरा बनाती हैं। इसके बाद तालियों की थाप पर गोल-गोल घूमते हुए छत्तीसगढ़ी लोकगीत गाती हैं। इन गीतों में शिव-पार्वती, गणेश, राम-सीता और लक्ष्मण सहित देवी-देवताओं के प्रसंगों का वर्णन किया जाता है। साथ ही परिवार और गांव की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की जाती है।

नगर सहित तरेगा, देवरी, खोखली, सुमा और रोहरा समेत आसपास के गांवों में सुआ नृत्य की टोलियां घरों के आंगन और दुकानों तक पहुंच रही हैं। मांदर और पेटी की धुन पर पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति दी जा रही है। छोटी-छोटी बालिकाएं पारंपरिक साड़ी पहनकर नृत्य में शामिल हो रही हैं, वहीं महिलाओं के समूह भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। सुआ नृत्य देखने के लिए बच्चों और ग्रामीणों की भीड़ जुट रही है।

देवी मंदिरों में भी हो रही प्रस्तुति

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं देवी मंदिरों, कुलदेवी के स्थानों और अन्य धार्मिक स्थलों पर भी सुआ नृत्य करती हैं। प्रस्तुति के बाद ग्रामीण अपनी सामर्थ्य के अनुसार टोली को रुपए, अनाज और उपहार भेंट करते हैं। इसके बदले नृत्य दल के सदस्य पारंपरिक गीतों के माध्यम से परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की मंगलकामना करते हैं।

आधुनिकता के इस दौर में भी सुआ नृत्य की परंपरा अपनी पहचान बनाए हुए है। बुजुर्ग महिलाओं के साथ नई पीढ़ी की बालिकाओं की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराएं आज भी जीवंत हैं।

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