- विवाद की पृष्ठभूमि और नया कानूनी मोड़
बिलासपुर।बिलासपुर के राजकिशोर नगर में रात के सन्नाटे में शुरू हुआ एक मामूली विवाद अब राज्य का सबसे चर्चित कानूनी मामला बन चुका है। जन्मदिन की पार्टी में बज रहे तेज नगाड़े और आतिशबाजी को लेकर महासमुंद कुटुंब न्यायालय के न्यायाधीश प्रफुल्ल कुमार सोनवानी और दूसरे पक्ष के बीच शुरू हुई बहस मारपीट में बदल गई थी। इस घटना में पहले न्यायाधीश और उनके परिवार की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया था, लेकिन अब पुलिस ने दूसरे पक्ष की शिकायत पर न्यायाधीश, उनकी पत्नी और उनके साले के खिलाफ क्रॉस-एफआईआर दर्ज कर ली है। एक सिटिंग जज के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही कानूनी गलियारों से लेकर आम जनता के बीच इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि अब पुलिस आगे क्या कदम उठाएगी।
न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के विशेष नियम
आम नागरिकों के मुकाबले किसी भी सेवारत न्यायाधीश (Sitting Judge) के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और जांच करने की प्रक्रिया पूरी तरह अलग और बेहद संवेदनशील होती है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य’ (1991) मामले में स्पष्ट गाइडलाइंस जारी की थीं, जिसके तहत पुलिस किसी भी जज के खिलाफ सीधे सामान्य तरीके से दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर सकती। कानूनन, किसी न्यायिक अधिकारी पर एफआईआर दर्ज करने के बाद जांच को आगे बढ़ाने या किसी भी तरह की पूछताछ के लिए संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय (High Court) के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) को सूचित करना और उनकी प्रशासनिक अनुमति या दिशा-निर्देश लेना अनिवार्य होता है।
गिरफ्तारी और पुलिसिया कार्रवाई पर कानूनी रोक
इस मामले में सबसे बड़ा पेंच पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर फंसा हुआ है क्योंकि पुलिस किसी न्यायाधीश को सामान्य आरोपी की तरह न तो थाने बुला सकती है और न ही उन्हें सीधे गिरफ्तार कर सकती है। यदि अपराध अत्यंत गंभीर श्रेणी का भी हो, तब भी गिरफ्तारी की स्थिति में स्थानीय जिला न्यायाधीश और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को तुरंत आधिकारिक तौर पर अवगत कराना होता है। न्यायिक स्वतंत्रता और पद की गरिमा को बनाए रखने के लिए कानून में जजों को यह विशेष संरक्षण दिया गया है, ताकि कोई भी पक्ष उन पर झूठे आरोप लगाकर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित न कर सके।







