नई दिल्ली ।साधारण से फ्लैट के कमरे में मेडिकल बेड पर हरीश (31) बेसुध लेटा है। पेट में पैग सेट पाइप और नाक में ऑक्सीजन पाइप लगा है। घर में परिजन, जानने वाले, अनजान, सरकारी अधिकारी व मीडियावालों का जमावड़ा लगा है।
पिता अशोक राणा भरे गले से बता रहे हैं कि हमारी साढ़े बारह साल की सेवाओं का हिसाब-किताब अब पूरा हो रहा है, इसलिए यह फैसला आ गया। हरीश की मां ने एक दिन कहा कि अब तो हम भी बूढ़े हो रहे हैं, इसकी देखभाल कौन करेगा? राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से गुहार लगानी चाहिए। ब्रह्मकुमारी परिवार से जुड़े राणा परिवार ने अपना दर्द दीदी से साझा किया तो उन्होंने एक वकील भेजा। राणा कहते हैं, ‘हाईकोर्ट ने तो हमारी याचिका खारिज ही कर दी थी, पर सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी देकर हरीश पर बड़ा उपकार किया, हमसे उसकी पीड़ा देखी नहीं जाती, बेबसी ये है कि वह बता भी नहीं पाता कि उसे कहां-क्या तकलीफ है। हमारा तो बच्चा है, सेवा कर रहे हैं और जब तक सामर्थ्य है करते ही रहेंगे। कोर्ट के फैसले के बाद एम्स ने सभी तैयारी कर ली है। बस हमें तय करना है कि उसे आखिरी बार इस बिस्तर से उठाकर कब एम्स ले चलें। हम तो इसे पैसिव यूथेनेशिया भी नहीं बोलना चाहते। हम इसे भगवान की गोद में छोड़ रहे है। हम उसे ऐसे अनुभवी चिकित्सकों के पास छोड़ रहे हैं जो उसे घातक इंजेक्शन नहीं देंगे बल्कि प्राकृतिक रूप से जीवन छोड़ने का रास्ता सुगम करेंगे। एम्स में अनुभवी डॉक्टरों की निगरानी में सिर्फ फूड पाइप हटाएंगे। हम उसे पानी पिलाते रहेंगे जैसे कोई व्रत करता है। और जब हरीश प्राण त्याग देगा तो बहुत गौरव व सम्मान से घर लाएंगे और अंतिम विदाई देंगे।
मां चुप हैं, एकदम भावशून्य चेहरा, खुशी कि बच्चे को मुक्ति मिल रही है और न गम कि आखिरी घड़ी आ पहुंची। हालांकि कुछ बोलते ही फफक पड़ती हैं… कौन मां-बाप अपने बच्चे को इस स्थिति में ले जाना चाहेगा। जिसे जन्म दिया, पाल-पोसकर बड़ा किया। फिर से अबोध की तरह उसकी देखभाल करनी पड़ी तो उसमें मां को कष्ट कैसा। दुख तो बस इस बात का रहा कि इसने तो अपनी पीड़ा भी नहीं बताई। सुबह-शाम जब उसकी मालिश करती तो मैं उसे घर के किस्से सुनाती आज क्या-क्या हुआ? कई बार घंटों तक बस इंतजार करती कि एक बार बस पलक झपके ताकि मुझे लगे कि उसने सब सुन लिया। कभी उबासी लेता, कभी छींक आती या आंखों के आसपास की त्वचा फड़कती तो हमें उसी से उसके जिंदा होने का सुकून होता था। कई बार लगता कि वह कुछ बोलना तो चाहता है पर हम समझ ही नहीं पाते।
2013 में रक्षा बंधन के दिन चंडीगढ़ में उसके चार मंजिल से गिरने की खबर मिली थी। रात को ही हम पहुंचे तो इसे अचेत पाया। पहले 10 दिन वहीं पीजीआई में रहा, फिर एम्स दिल्ली में एक महीने वेंटीलेटर पर रहा। अगले कुछ महीने कभी अपोलो, कभी मेदांता और कई अस्पतालों में रहा। डॉक्टरों ने बताया कि वह लाइलाज स्थिति में पहुंच गया, सिर्फ दुआ और सेवा ही बची है। हम घर ले आए, शुरू में काफी परेशानियां होती थीं, पाइप डलवाने बार-बार अस्पताल ले जाना पड़ता था। नर्स व फिजियोथेरेपिस्ट भी रखा, लेकिन कुछ भी व्यावहारिक नहीं रहा।
इलाज पर करीब 43 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। दिल्ली का अपना घर बेच दिया। कोरोना आया तो हिमाचल प्रदेश में अपने गांव चले गए। न बेटी की शादी की और 2021 में गाजियाबाद का यह फ्लैट लिया। छोटे बेटे आशीष ने हरीश की जी-जान से सेवा की। उसे तो इतना भी नहीं पता
हम जानते हैं उसे आखिरी बार बिस्तर से क्यों उठा रहे हैं… उसे भगवान की गोद में छोड़ रहे हैं- पिता
आशीष बताते हैं, ‘दुर्घटना के वक्त मैं बारहवीं में था। हमेशा मैं और मां ही भैया की दिनचर्या संभालते रहे। सुबह 4 बजे उठना, बेड से उठाकर व्हीलचेयर पर बिठाना, स्पंज करना, तेल मालिश, फिजियोथैरेपी और फिर वापस बेड पर लिटाना। शाम को छह बजे फिर से मालिश, फिजियोथैरेपी और पैटट्यूब से हर दो घंटे में लिक्विड फीड जैसे दाल का पानी, रोटी पीसकर, कभी अंडा, कभी जूस, कभी दूध देना। बीते साढ़े 12 वर्षों में मैंने या मां ने अकेले, या हम दोनों ने साथ ही उनकी सेवा की। एक वक्त था कि पैग सेट (फूड पाइप), कैथेटर, यूरोबैग जैसी तमाम चीजें अजीब लगती थी। लेकिन धीरे-धीरे सब सीख गए… सेक्शन ट्यूब से बलगम कैसे निकालना है, बेटाडीन से दांत कैसे साफ करने हैं। डायपर बदलने में कभी हिचक नहीं हुई। बेडसोर हुए तो खुद ही इलाज करने लगे।
आशीष कहते हैं, ‘2014 में उम्मीद बंधी थी कि भाई रिकव रिकवरी कर लेगा। उस वक्त किसी ने हायपरबेरिक ऑक्सीजन थैरेपी कराने का सुझाव दिया था। 30 दिन का यह कोर्स अपोलो और आरएमएल में उपलब्ध था। कोर्स के दौरान कुछ सुधार आया था जैसे आंख के पास मक्खी-मच्छर कुछ बैठ जाए तो आंखों के आसपास की चमड़ी रिएक्ट करती थी, इरिटेशन व सेंसेशन भी दिखने लगी थी। इस थैरेपी के दौरान मरीज को सामान्य से दो से तीन गुना अधिक दबाव वाले चैंबर में 100 फीसदी ऑक्सीजन में रखा जाता है। उस दौरान दिमाग में 80 फीसदी ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचती है। पर यह उपाय भी कारगर नहीं रहा।





