आजादी के गुमनाम हीरो : आज़ादी के जश्न के बीच इतिहास का वो काला शुक्रवार और कोलकाता का ‘रक्षक’ गोपाल पाठा

हर साल जब १५ अगस्त को पूरा देश तिरंगे के साये में स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाता है, तो लाल किले की प्राचीर से गूंजती आज़ादी की आवाज़ के पीछे विभाजन की एक गहरी और दर्दनाक चीख भी सुनाई देती है। इतिहास के पन्नों को पलटने पर ठीक आज़ादी से एक साल पहले की एक ऐसी तारीख सामने आती है जिसने अखंड भारत के सीने पर नफरत की ऐसी खूनी लकीर खींची कि सदियों का भाईचारा पल भर में राख हो गया। वह तारीख थी १६ अगस्त १९४६, जिसे दुनिया ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ या ‘द ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स’ के काले नाम से जानती है। आज़ादी की दहलीज पर खड़े भारत के साथ उस दिन जो दरिंदगी हुई, उसकी दास्तान आज भी रूह कँपा देती है। लेकिन इस खूनी नरसंहार के बीच एक ऐसा नाम भी उभरा जिसने कलकत्ता के असहाय लोगों के लिए ढाल बनकर दंगाइयों का रास्ता रोक दिया, और वो नाम था गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय, जिन्हें दुनिया ‘गोपाल पाठा’ के नाम से जानती है।साल १९४६ में जब ब्रिटिश सरकार ने भारत को आज़ादी देने के लिए कैबिनेट मिशन भेजा, तो मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना एक अलग देश पाकिस्तान की मांग पर अड़ गए। जब बातचीत से बात नहीं बनी, तो जिन्ना ने लोकतांत्रिक रास्तों को छोड़कर सड़कों पर सीधे टकराव का एलान करते हुए १६ अगस्त को पूरे देश में डायरेक्ट एक्शन डे मनाने की घोषणा कर दी। बंगाल में उस समय मुस्लिम लीग की सुहरावर्दी सरकार थी, जिसने इस दिन सरकारी छुट्टी का एलान कर दिया ताकि दंगाइयों को खुली छूट मिल सके। देखते ही देखते कलकत्ता की सड़कों पर ऐसा वहशियाना तांडव शुरू हुआ कि महज ७२ घंटों के भीतर चार हजार से ज्यादा बेकसूर लोग काट दिए गए, दुकानों को लूटकर घरों को फूंक दिया गया और महिलाओं व बच्चों को बेरहमी से निशाना बनाया गया। जब पुलिस तमाशबीन बनी थी और सुहरावर्दी की शह पर एकतरफा कत्लेआम चल रहा था, तब कलकत्ता के मल्लिका बाजार इलाके में बकरे का व्यापार करने वाले एक आम इंसान गोपाल पाठा ने इतिहास का रुख मोड़ने का फैसला किया।गोपाल पाठा ने गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत के बजाय इस संकट की घड़ी में ‘शठे शाठ्यं समाचरेत’ यानी जैसे को तैसा की नीति अपनाई। उन्होंने तुरंत अपने साथ स्थानीय युवाओं, अखाड़े के पहलवानों और जांबाज साथियों को इकट्ठा करके ‘भारतीय जातीय वाहिनी’ नाम का एक आत्मरक्षा संगठन खड़ा किया। गोपाल पाठा ने अपने साथियों को साफ निर्देश दिया था कि वे किसी भी बेकसूर या दूसरे धर्म के असहाय व्यक्ति पर हाथ नहीं उठाएंगे, लेकिन अगर कोई उनके इलाके की महिलाओं, बच्चों या नागरिकों पर हमला करने आएगा, तो उसे जिंदा वापस नहीं जाने देंगे। जब अगले दिन दंगाइयों की फौज हिंदुओं की बस्तियों को राख करने के इरादे से आगे बढ़ी, तो गोपाल पाठा की वाहिनी ने अदम्य साहस दिखाते हुए उन पर जवाबी हमला बोल दिया। उन्होंने न केवल अपने इलाके की रक्षा की, बल्कि दंगाइयों को खदेड़कर कलकत्ता का पूरा भूगोल बदलने से बचा लिया। तीन दिनों तक चले इस पलटवार ने मुस्लिम लीग के हौसले पस्त कर दिए और सुहरावर्दी सरकार को सेना बुलाने पर मजबूर होना पड़ा।इस खूनी संघर्ष के शांत होने के बाद जब महात्मा गांधी कलकत्ता पहुंचे, तो उन्होंने गोपाल पाठा से अपने हथियार डालने और अहिंसा का मार्ग अपनाने को कहा। इस पर गोपाल पाठा ने बड़ी विनम्रता लेकिन दृढ़ता से गांधी जी से कहा कि वह अपने हथियार डाल सकते हैं, बशर्ते गांधी जी यह गारंटी दें कि दोबारा दंगाइयों के हमले होने पर वे उनकी महिलाओं और बच्चों की रक्षा खुद करेंगे। जब गांधी जी ऐसा कोई आश्वासन नहीं दे सके, तो गोपाल पाठा ने अपनी कौम की सुरक्षा के लिए हथियार सौंपने से साफ इनकार कर दिया। आज जब हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं और भारत की आज़ादी का उत्सव मना रहे हैं, तब डायरेक्ट एक्शन डे का यह भयावह इतिहास और गोपाल पाठा का पराक्रम हमें याद दिलाता है कि आपसी भाईचारा और अनेकता में एकता ही इस देश की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन आत्मरक्षा और न्याय के लिए खड़ा होना भी उतना ही जरूरी है।

Hot Topics

Related Articles