संवाददाता-प्रदुमन सिंह, कोरिया। एचडीएफसी बैंक परिवर्तन एवं वाटरशेड ऑर्गेनाइजेशन ट्रस्ट द्वारा संचालित फोकस डेवलपमेंट कार्यक्रम अंतर्गत आज ग्राम लब्जी एवं दामूज के शासकीय माध्यमिक शाला एवं आदिवासी बालक छात्रावास में स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त तत्वाधान से राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और समय पर उन को दवाओं एवं वैक्सीन की पहुंच के लक्ष्य को लेकर किया गया है क्योंकि गांव में कई बच्चे कृमि संक्रमण के खतरे में हैं, भले ही वे बाहर से स्वस्थ दिखते हों। ये छोटे-छोटे कृमि आंतों में रहते हैं और चुपचाप उन पोषक तत्वों को चुरा लेते हैं जिनकी बच्चों को बढ़ने, सीखने और सक्रिय रहने के लिए आवश्यकता होती है।
*कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग से श्रीमति राधिका सिंह ने कहा* की अगर कृमियों का इलाज न किया जाए, तो वे कमजोरी, थकान, एनीमिया (खून में बैक्टीरिया की कमी) और अन्य समस्याएं पैदा कर सकती हैं। बच्चों को इन छिपे हुए खतरों से बचाने के लिए, भारत सरकार ने 2015 में राष्ट्रीय कृमि नाशक दिवस की शुरुआत की। इस दिन स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को मुफ्त और सुरक्षित कृमिनाशक गोलियां दी जाती हैं।
*कार्यक्रम में श्री मगर सिंह आदिवासी बालक छात्रावास अधीक्षक ने कहा*, “’कृमिनाशक दवा से मुक्त बच्चे, स्वस्थ बच्चे’ के नारे का पालन करते हुए, 10 अगस्त को कोई भी बच्चा छूटना नहीं चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मचारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक पात्र बच्चा गोली का सेवन करे।”
अक्सर लोग मानते हैं कि पेट के कीड़े सिर्फ बच्चों या गंदा खाना खाने वालों की समस्या हैं। बहुत से वयस्क यह भी सोचते हैं कि घर का साफ-सुथरा, पका हुआ खाना खाने से वे पूरी तरह सुरक्षित हैं। लेकिन भारत जैसे देश में यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। यहां पेट में कीड़े होने का खतरा केवल खाने से नहीं, बल्कि आसपास के वातावरण से भी जुड़ा होता है
पेट के कीड़े सिर्फ बच्चों, गंदा खाना खाने वालों या ग्रामीण इलाके की समस्या नहीं हैं। वयस्क भी पर्यावरण से सूक्ष्म अंडे/लार्वा के कारण संक्रमित हो सकते
*डिवर्मिंग क्यों जरूरी है?*
पेट के कीड़े शरीर में पोषक तत्वों को सोख लेते हैं। इससे आयरन, विटामिन-बी12, प्रोटीन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है। लंबे समय तक इन्फेक्शन रहने पर एनीमिया, कमजोरी, थकान, इम्युनिटी कमजोर होना और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। कई बार लोग इन लक्षणों को तनाव, खराब खानपान या सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।
*साल में कितनी बार डिवर्मिंग जरूरी है?*
बच्चों में पेट के कीड़े ज्यादा पाए जाते हैं, इसलिए ज्यादा जोखिम वाले इलाकों में रहने वाले बच्चों को साल में दो बार डिवर्मिंग की सलाह दी जाती है। वयस्कों के लिए रूटीन तौर पर खुद से दवा लेना सही नहीं है। अगर बार-बार पेट की समस्या, मिट्टी या पालतू जानवरों के संपर्क में रहना या शेयर्ड टॉयलेट का इस्तेमाल होता है, तो जांच और सलाह के बाद डिवर्मिंग कराई जानी चाहिए।
डिवर्मिंग की दवाएं आमतौर पर सुरक्षित होती हैं, लेकिन प्रेग्नेंट महिलाएं, ब्रेस्टफीड कराने वाली महिलाएं, लिवर की बीमारी या गंभीर एनीमिया से पीड़ित लोगों को बिना सलाह दवा नहीं लेनी चाहिए। बार-बार खुद से दवा लेना भी नुकसानदायक हो सकता है।
*कैसे बचें इस समस्या से?*
डिवर्मिंग दवाएं शरीर में मौजूद कीड़ों को खत्म करती हैं, लेकिन अगर साफ-सफाई पर ध्यान न दिया जाए तो दोबारा इन्फेक्शन हो सकता है। इसलिए साफ पानी पीना, सब्जियों और फलों को अच्छी तरह धोना, हाथों की सफाई, जूते-चप्पल पहनना और साफ-सुथरे टॉयलेट का इस्तेमाल बेहद जरूरी है।
कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग से श्रीमति राधिका सिंह , छात्रावास अधीक्षक श्री मगर सिंह, शिक्षक, अभिभावक वाटर संस्था से सुधान सरकार, अंजु कुमार, उदित, सतेंद्र कुमार उपस्थित रहे।














