- सहसपुर ग्राम पंचायत में 15वें वित्त की राशि में बड़ा गोलमाल
कमल कुमार मेश्राम,राजनांदगांव। जनपद पंचायत डोंगरगढ़ के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतों में 15वें वित्त आयोग की राशि में बंदरबांट और भ्रष्टाचार का खेल अब एक सिलसिला बन चुका है। जनपद क्षेत्र की एक के बाद एक पंचायतों में सरकारी राशि के गबन और परिवारिक सिंडिकेट के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अफसरों की कुंभकर्णी नींद टूटने का नाम नहीं ले रही है। कोटिटोला में रोजगार सहायक दंपति के कारनामों का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि अब एजी खबर के हाथ ग्राम पंचायत सहसपुर में सरकारी खजाने से जुड़े दस्तावेजों की परतें खुलने लगी हैं।
सहसपुर पंचायत में सरपंच युवराज चंद्रवंशी और सचिव जय राम वर्मा की जोड़ी ने पंचायती राज के तमाम कायदे-कानूनों को ताक पर रखते हुए अपने डिजिटल हस्ताक्षर से बिना करे वाले सादे कागज के बिलों पर लाखों रुपये एक ही परिवार के दो अलग-अलग बैंक खातों में पार कर दिए हैं। एजी खबर की पड़ताल में सामने आए दस्तावेज बताते हैं कि पंचायत में निर्माण और सामग्री के नाम पर कुल 14 किस्तों में 4 लाख 11 हजार 500 रुपये निकाले गए हैं। इसमें से 12 किस्तों के 3 लाख 64 हजार 300 रुपये अकेले ग्राम मुड़िया (भोथरा) के सप्लायर परमानंद साहू और उसकी पत्नी ज्योति साहू की झोली में डाल दिए गए हैं।
बिल सप्लायर के नाम का, पैसा जा रहा पत्नी के संयुक्त खाते में
सरकारी भंडार क्रय नियम साफ कहते हैं कि जिस फर्म या वेंडर के नाम पर पक्का बिल लगता है, भुगतान भी सिर्फ उसी के व्यावसायिक खाते में हो सकता है, लेकिन सहसपुर के सरपंच और सचिव ने भ्रष्टाचार की नई इबारत लिख डाली है। पंचायत में नई इमारत तो परमानंद साहू (बिल्डिंग मटेरियल सप्लायर एवं ठेकेदार) के नाम से लगाए गए हैं, मगर सरकारी तिजोरी से भुगतान दो अलग-अलग खातों में किया गया है। चार बार में 95 हजार 239 रुपये खुद सप्लायर परमानंद साहू के व्यक्तिगत खाते में डाले गए, तो वहीं आठ बार में 2 लाख 69 हजार 61 रुपये की भारी-भरकम राशि परमानंद साहू एवं ज्योति साहू के संयुक्त बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी गई। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब बिल ठेकेदार फर्म के नाम का है, तो सरकारी पैसा पत्नी के संयुक्त बचत खाते में ऑनलाइन पोर्टल से कैसे के जरिए सीधे पसीना बहाने वाले ग्रामीण मजदूरों के खातों में जाना अनिवार्य है, लेकिन सहसपुर में मजदूरों का हक मारकर मजदूरी की रकम भी सीधे सप्लायर दंपति के मजदूरी के 19 हजार रुपये भी बिना मस्टर रोल के सीधे ठेकेदार के खातों में ठिकाने लगा दिए गए। अंधेरगर्दी की हद तो तब हो गई जब आंगनबाड़ी निर्माण के लिए
पास हो गया? गरीब मजदूरों के पेट पर लात, ठेकेदार की तिजोरी में मजदूरी!
पंचायतों में ठेकेदारी प्रथा पूरी तरह प्रतिबंधित है और किसी भी निर्माण कार्य में मजदूरी का पैसा मस्टर रोल खातों में डकार ली गई है। नाली निर्माण के नाम पर 60 रेजा और 55 मिस्त्री दिखाकर 40 हजार रुपये का कच्चा बिल ठेकेदार के लेटरहेड पर बनाया गया और पूरी रकम पति-पत्नी के संयुक्त खाते में डाल दी गई। इसी तर्ज पर मंच निर्माण मजदूरी के 46 हजार रुपये, नाली निर्माण मजदूरी के 22 हजार रुपये और कचरा ढुलाई ऑनलाइन पोर्टल पर 30 हजार रुपये की सामग्री खरीदी दिखाई गई, लेकिन उसके पीछे लगे कच्चे बिल में रेत-गिट्टी के साथ 8 हजार रुपये की मजदूरी जोड़कर रकम निकाल ली गई।
डोंगरगढ़ जनपद में भ्रष्टाचार का बोलबाला, अफसरों की सांठगांठ है?
डोंगरगढ़ जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली पंचायतों में लगातार एक के बाद एक ऐसे वित्तीय मामले सामने आ रहे हैं, लेकिन जनपद स्तर पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी उनकी कार्यप्रणाली की सीधे संदेह के कटघरे में खड़ा करती है। सहसपुर पंचायत में लगाए गए तमाम बिल महज बाजार से छपाए गए सादे कैश मेमो हैं, जिन पर न तो कर पंजीयन है और न ही कोई वैध नंबर। 30 हजार रुपये की जीरा मिट्टी के बिल में मात्रा के आगे सिर्फ 2 लिखा है। अब यह गिट्टी दो ट्रैक्टर है, दो ट्राली है या दो तगाड़ी, यह सिर्फ सरपंच-सचिव और उनका ठेकेदार ही जानते हैं। बिना खनिज रॉयल्टी पर्ची और बिना कर कटौती के लाखों रुपये का यह आहरण साफ इशारा करता है कि पंचायत से लेकर जनपद के गलियारों तक सब कुछ बिना मिलीभगत के संभव नहीं है।
एजी खबर द्वारा प्रमाण सहित इन तमाम मामलों को सामने लाए जाने के बाद अब गेंद जिला और जनपद प्रशासन के पाले में है।
देखना यह होगा कि जनपद पंचायत डोंगरगढ़ में लगातार सामने आ रहे इन वित्तीय मामलों पर जिला कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ क्या कदम उठाते हैं, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा रह जाता है?
- पांडेय बुक डिपो का गजब का चमत्कार! डोंगरगढ़ जनपद की 70 से 80 प्रतिशत पंचायतों में चलता है इनका ही जादू?
सप्लायर दंपति के अलावा डोंगरगढ़ क्षेत्र की पंचायती में स्टेशनरी और फोटोकॉपी के बिलों का भुगतान लेने वाला पांडेय बुक डिपो का दबदबा भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। क्षेत्र में खुली चर्चा है कि डोंगरगढ़ जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली लगभग सत्तर से अस्सी प्रतिशत पंचायतों में सरकारी फाइलों और स्टेशनरी खरीदी के नाम पर अकेले इसी दुकान के बिल पास होते हैं।
सहसपुर पंचायत में भी स्टेशनरी सामग्री खरीदी के नाम पर शरद कुमार पांडेय के व्यक्तिगत खाते में एकमुश्त 32 हजार 200 रुपये का भुगतान किया गया है। सवाल यह उठ रहा है कि एक छोटी सी ग्राम पंचायत में एक ही बार में इतनी बड़ी मात्रा में स्टेशनरी की क्या जरूरत पड़ गई और बिना पक्के बिल के इतनी बड़ी रकम इस दुकान संचालक के निजी खाते में कैसे पहुंचा दी गई? इसी तरह फुलिया फिटिंग के नाम पर पाल ट्रेडर्स को भी 15 हजार रुपये का भुगतान किया गया है।






