एमसीबी।छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) जिले के एक सुदूर गांव में रहने वाले एक आम नागरिक का नाम ‘राष्ट्रपति’ होने का एक बेहद अनोखा और दिलचस्प मामला अब देश के सर्वोच्च कार्यालयों तक पहुंच गया है। जिले के मनेन्द्रगढ़ ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले ग्राम घुटरा में रहने वाले एक व्यक्ति का नाम आधिकारिक और सरकारी दस्तावेजों में ‘राष्ट्रपति’ दर्ज है। इस नाम को लेकर अब देश में शीर्ष संवैधानिक पदों और राष्ट्रीय गरिमा से जुड़े शब्दों के व्यक्तिगत उपयोग को विनियमित करने तथा इसके लिए एक ठोस कानूनी नीति या कानून बनाने की मांग तेजी से उठने लगी है, जिसने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया जब ब्लॉक कांग्रेस कमेटी मनेन्द्रगढ़ शहर के अध्यक्ष सौरव मिश्रा ने भारत के राष्ट्रपति सचिवालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में अलग-अलग औपचारिक याचिकाएं दाखिल कीं। सौरव मिश्रा ने अपनी याचिका में दलील दी है कि ‘राष्ट्रपति’, ‘प्रधानमंत्री’, ‘मुख्यमंत्री’, ‘राज्यपाल’ और ‘भारत’ जैसे शब्दों का व्यक्तिगत नाम के रूप में इस्तेमाल होने से भविष्य में कई तरह के प्रशासनिक असमंजस और अजीबोगरीब स्थितियां पैदा हो सकती हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि राष्ट्रीय गरिमा और गरिमामय पदों के नामों का आम नागरिकों द्वारा व्यक्तिगत उपयोग (जैसे बच्चों के नाम रखना) प्रतिबंधित या विनियमित करने के लिए कानूनी विशेषज्ञों से विचार-विमर्श कर एक स्पष्ट विधेयक या मार्गदर्शिका तैयार की जाए।
इस अनोखी और गंभीर विषय वाली याचिका पर तुरंत संज्ञान लेते हुए राष्ट्रपति सचिवालय ने मामले को आवश्यक कार्रवाई के लिए गृह मंत्रालय (MHA) और विधि एवं न्याय विभाग को अग्रसारित (फॉरवर्ड) कर दिया है। इसी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय में भी इस पर अग्रिम प्रक्रिया जारी होने की जानकारी दी गई है। हालांकि, सचिवालय द्वारा इस पत्र को संबंधित मंत्रालयों को भेजे जाने का यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि देश में कोई नया कानून तुरंत लागू हो गया है, बल्कि यह केंद्र सरकार के स्तर पर इस नीतिगत विषय की समीक्षा करने और इस पर विचार करने की एक शुरुआती प्रशासनिक प्रक्रिया है।
दूसरी तरफ, इस पूरे विवाद के केंद्र में मौजूद ग्राम घुटरा के निवासी ‘राष्ट्रपति’ एक बेहद साधारण व्यक्ति हैं जो मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनके पास मौजूद 1988 के स्कूल रिकॉर्ड, रिपोर्ट कार्ड, बैंक पासबुक और आधार कार्ड सहित सभी आवश्यक सरकारी दस्तावेजों में उनका वास्तविक नाम यही दर्ज है। उन्होंने बताया कि उनके जन्म के समय उनके माता-पिता ने ही बड़े चाव से उनका यह नाम रखा था और वे जीवनभर इसी नाम के साथ सामान्य रूप से रहते आए हैं। इस पूरे प्रकरण ने अब देश में जहां एक तरफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नामकरण के अधिकार पर बहस छेड़ दी है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय प्रतीकों और संवैधानिक मर्यादाओं के संरक्षण को लेकर कानून बनाने की मांग को नई दिशा दे दी है।






