बिहार की पावन मोक्ष भूमि गया जी में इन दिनों आस्था और श्रद्धा का एक अनूठा महाकुंभ लगा हुआ है, जहां विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला 2026 अपने चरम पर है. देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु फल्गु नदी के पावन तट, विष्णुपद मंदिर, प्रेतशिला और रामशिला जैसी प्रमुख वेदियों पर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म कर रहे हैं. इस महापर्व की शुरुआत बिहार के मुख्यमंत्री द्वारा भव्य उद्घाटन के साथ हुई और प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा के लिए इस बार तकनीक और परंपरा का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है।इस वर्ष के मेले की सबसे खास बात यह है कि खोने-पाने की समस्याओं से निपटने के लिए बुजुर्गों और बच्चों को विशेष क्यूआर कोड युक्त रिस्ट बैंड पहनाए जा रहे हैं, जिससे भीड़ में उनके बिछड़ने पर तुरंत उनके परिजनों का पता लगाया जा सके. इसके अलावा, एआई कैमरों की मदद से चेहरे की पहचान कर सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक पुख्ता किया गया है. पूरे गया शहर का कायाकल्प करते हुए स्थानीय बच्चों ने दीवारों पर भगवान विष्णु से जुड़ी बेहद खूबसूरत कलाकृतियां उकेरी हैं, जो आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक मुख्य आकर्षण बनी हुई हैं. श्रद्धालुओं के लिए भारी संख्या में निशुल्क आवास, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, और चिकित्सा शिविरों की चौबीसों घंटे व्यवस्था की गई है।धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गया की इस पावन भूमि का संबंध गयासुर नाम के एक परम वैष्णव असुर से है, जिसकी पीठ पर स्वयं भगवान विष्णु विराजमान हुए थे और वरदान दिया था कि जो भी इस स्थान पर आकर अपने पितरों का श्राद्ध करेगा, उसके पूर्वज जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर सीधे वैकुंठ को प्राप्त करेंगे. इसी पावन भूमि पर त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान किया था. कथाओं के अनुसार, जब राम और लक्ष्मण सामग्री लेने गए थे, तब राजा दशरथ की व्याकुल आत्मा ने माता सीता से पिंड की मांग की, जिस पर माता सीता ने फल्गु नदी के किनारे की बालू से ही पिंड बनाकर अपने ससुर का तर्पण कर दिया था, जिसके बाद से ही यहाँ बालू से पिंडदान की यह परंपरा आज तक चली आ रही है।मेले के आगे बढ़ते दिनों के साथ अलग-अलग वेदियों पर विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है. हाल ही में श्रद्धालुओं ने बोधगया के धर्मारण्य, मातंगवापी और सरस्वती वेदी पर जाकर त्रिपिंडी श्राद्ध किया, जिसके बारे में माना जाता है कि महाभारत काल में स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर ने भी यहाँ अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान किया था. इसके ठीक बाद, आश्विन कृष्ण चतुर्थी और पंचमी की विशेष तिथि के अवसर पर ब्रह्म सरोवर, काकवेदी और आम्र सिंचन जैसी प्रधान वेदियों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा, जहां पिंडदान करने से पितरों को सीधे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है. गयापाल पंडा समाज के विद्वानों के अनुसार, गया में किया गया श्राद्ध पूर्वजों को परम तृप्ति प्रदान करता है और जो लोग अज्ञानतावश अपने पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथि नहीं जानते, वे भी आने वाली सर्वपितृ अमावस्या के दिन यहाँ आकर अपनी श्रद्धा प्रकट कर सकते हैं जिससे परिवार को पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
गया जी में उमड़ा आस्था का महाकुंभ: विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले में लाखों श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान, पूर्वजों के मोक्ष के लिए फल्गु तट पर गूंजे मंत्र








