पूरा परिवार अपने पुस्तैनी काम का संभालकर कर रहे हैं जीविकोपार्जन
डोंगरगांव (घनश्याम साव)डोंगरगांव नगर पंचायत श्रेत्र में वार्ड नंबर पांच कुम्हारपारा निवासी सोनऊ कुंभकार के पूरा परिवार गर्मी में लोगों के प्यास बुझाने के लिए इन दिनों देशी फ्रिज और मिट्टी के शानदार थरमस बनाने में जुट गए है यहीं उनकी रोजगार का मुख्य स्वोत है। पुराने समय में कुंभकार केवल खपरैल, दीया और मटकी, नंदी बैल आदि बनाया करते थे। समय के साथ साथ परिवर्तन और जागरूकता आने से मिट्टी कला में बदलाव के बाद इनका पूरा परिवार अब समय और आधुनिकता व लोगों की पसंद में बदलाव को देखते हुए उपयोगी और सजावट के समान बनाकर उन्हें बेचना शुरू कर दिया है। इनके द्वारा बनाये गये नये नये डिजाईन के समानों को लोग काफी पसंद भी कर रहें है,

बढ़ ग़ये मिट्टी के मोल, मेहनत का दाम नहीं मिल पा रहा है कुम्हारों को-
वर्तमान में मिट्टी के मोल बढ़ गए है पहले मिट्टी आसानी से मिल जाता था अब यह मिट्टी 5 किलोमीटर दूर वाहन किराया कर लाना पड़ रहा है इनके अलावा इन्हें पकाने के लिए आरामशीन से महंगी लकड़ी खरीदकर किराए के वाहन से घर तक पहुंचाना पड़ता है , इस महंगाई के दौर में कुंभकारों को उनकी मेहनत का सही कीमत वसूल कर पाना मुश्किल हो गया है, महंगाई के दौर में इसलिए उनकी कला भी उभर नहीं पा रही है।
गर्मी सीजन को देखते हुए तैयार कर है देशी फ्रिज और थरमस
लगातार गर्मी बढ़ने के बाद लोगों की मांग को देखते हुए
देसी फ्रीज व मिट्टी के धरमस गर्मी में शुभारंभ हो चुका है ऐसे में प्यास बुझाने के लिए लोग ठंडा पानी से गला तारने के लिए देसी फ्रिज और थरमस के साथ
मशहूर देशी मटका का उपयोग भी कर रहे हैं,
महंगाई बजट में इनके अलावा दूसरा कार्य नहीं होने से पुस्तैनी काम को रोजगार के स्वरूप मानकर पूरा कुम्हार परिवार भली भांति परिचित होते हैं इसलिए गर्मी के चलते कुम्हार परिवार दिन रात मेहनत कर मिट्टी से मटका तैयार कर और साथ ही मिट्टी के धरमस, देशी फ्रिज भी तैयार कर रहे हैं जिसमें में पानी रखने से पानी शीतल मय रहता है। इस पूरे कार्य में सोनऊ कुम्हार के पूरा परिवार में पुत्र देवेन्द्र कुम्हार , गजेन्द्र, बलराम और कुम्हार परिवार की बहु , योगिता, शुभांगी, चंद्रकला और लीला, सोनई का इस कार्य में योगदान दे रहे है, गर्मी सीजन में मिट्टी के देशी फ्रिज और थरमस तथा मटका का आडर
राजनांदगांव दुर्ग भिलाई रायपुर राजिम खैरागढ़ और नागपुर महाराष्ट्र तक आडर करके वाहन में ले जा रहे हैं, देवेन्द्र कुंभकार ने बताया हैं कि वे पिछले कई पीढ़ियों से मिट्टी के समान बनाते आ रहें है। पहले उनके परिजन मटकी, दिया, ज्योतिकलश और खपरैल बनाया करते थे। लोगों की रूचि में आए बदलाव के बाद वह अब युनिट चॉक के माध्यम से कलश, लोटा, कण्डिल, लैंप दिया, कछुआ दिया, शिवलिंग, अनानास, गुलदस्ता, कप प्लेट, गिलास, कुकर, नारियल, पूजा दिया, अगरबत्ती स्टैण्ड, हाथी, घोड़ा, घंटी, गमला इत्यादि सुंदर एवं मनमोहक मिट्टी के सामान लोगों को काफी पसंद आते है। माटी शिल्पकारों ने बताया कि इन समानों से जीविकोपार्जन लायक आमदनी हो जाती है, किंतु प्रशासन प्रशिक्षण के साथ साथ सुनिक्षित बाजार उपलब्ध कराकर उनकी मेहनत को शासन प्रशासन द्वारा कुंभकारों के लिए एक अलग योजना तैयार की जाए तो उनकी कला में और भी निखार आ जाएगी। जिससे हमारे युवा पीढ़ी जो कि होटल, व अन्य दुकानो में रोजी मजदूरी कर रहें है वे प्राचीन कला और हमारी पुस्तैनी कारोबार को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।






