छत्तीसगढ़ के निजी स्कूलों में RTE फंड का मामला गरमाया, ड्रेस-किताब के नाम पर 1.84 करोड़ का बड़ा खेल

छत्तीसगढ़ :- छत्तीसगढ़ के निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत पढ़ रहे गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को मिलने वाली ड्रेस और किताबों की राशि को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक जिले में ही 31 हजार से ज्यादा RTE विद्यार्थियों के नाम पर करीब 1.84 करोड़ रुपए की राशि निर्धारित है। आरोप है कि सरकार से राशि मिलने के बावजूद कई बच्चों और उनके अभिभावकों को इसका वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है। मामला सामने आने के बाद अब जिले में इसकी जांच की तैयारी शुरू हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस राशि का प्रावधान बच्चों की ड्रेस और किताबों के लिए किया गया है, वह वास्तव में उन्हीं पर खर्च हो रही है या निजी स्कूल प्रबंधन अपनी सुविधा के अनुसार इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

31,191 बच्चों के नाम पर 1.84 करोड़ की राशि

वर्ष 2025-26 में जिले के 562 निजी स्कूलों में RTE के तहत कुल 31,191 बच्चे अध्ययनरत रहे। शासन के प्रावधान के अनुसार प्रत्येक बच्चे के लिए गणवेश के लिए 541 रुपए और पुस्तकों के लिए 250 रुपए निर्धारित किए गए हैं। यानी एक विद्यार्थी के लिए कुल 791 रुपए की राशि तय है। 31,191 विद्यार्थियों के हिसाब से यह राशि करीब 1.84 करोड़ रुपए बैठती है। यही वजह है कि अब पूरे मामले में स्कूलवार भुगतान और उसके उपयोग की जांच की मांग उठ रही है। आरोप है कि भुगतान की प्रक्रिया में राशि निजी स्कूल प्रबंधन के खातों तक पहुंच जाती है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ बच्चों या उनके पालकों तक नहीं पहुंचता। यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि RTE के तहत मिलने वाली सुविधा के उद्देश्य पर भी सवाल खड़ा करता है।

कागज पर RTE का लाभ, लेकिन बच्चों तक कितना पहुंचा?

RTE के तहत आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार दिया गया है। सरकार स्कूलों को इन विद्यार्थियों की शिक्षा से जुड़े खर्च के लिए निर्धारित राशि उपलब्ध कराती है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे या उनके पालक ही ड्रेस और किताबों का खर्च अपनी जेब से उठाने की बात कहते हैं। कुछ पालकों के मुताबिक, जब उन्होंने स्कूल प्रबंधन से ड्रेस और किताबों के लिए मिलने वाली राशि के बारे में जानकारी मांगी तो उन्हें कथित तौर पर बताया गया कि यह राशि स्कूल के खाते में आती है और स्कूल की जरूरत के हिसाब से खर्च की जाती है। अगर ऐसा है तो यह जांच का विषय है कि शासन द्वारा निर्धारित राशि का इस्तेमाल किस मद में किया जा रहा है और क्या उसका कोई रिकॉर्ड स्कूल प्रबंधन के पास मौजूद है

बड़े स्कूलों में 40 से 62 हजार रुपए तक की राशि

जिन निजी स्कूलों में RTE के तहत विद्यार्थियों की संख्या अधिक है, वहां ड्रेस और पुस्तक मद की राशि भी हजारों रुपए तक पहुंच रही है। जानकारी के अनुसार कुछ बड़े स्कूलों में यह राशि 40 हजार से लेकर करीब 62 हजार रुपए तक होने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बच्चों के लिए निर्धारित यह रकम वास्तव में कहां और किस तरह खर्च की जा रही है। पालकों को यदि राशि के भुगतान और उपयोग की जानकारी ही नहीं है तो पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं।

बिलासपुर

छत्तीसगढ़ के निजी स्कूलों में RTE फंड का मामला गरमाया, ड्रेस-किताब के नाम पर 1.84 करोड़ का बड़ा खेल

RTE Fund Irregularity: छत्तीसगढ़ के एक जिले में RTE के 31,191 बच्चों की ड्रेस और किताबों के लिए करीब 1.84 करोड़ रुपए की राशि पर सवाल उठे हैं। 562 निजी स्कूलों में राशि के उपयोग को लेकर जांच की तैयारी है।

RTE Children Fund: छत्तीसगढ़ के निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत पढ़ रहे गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को मिलने वाली ड्रेस और किताबों की राशि को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक जिले में ही 31 हजार से ज्यादा RTE विद्यार्थियों के नाम पर करीब 1.84 करोड़ रुपए की राशि निर्धारित है। आरोप है कि सरकार से राशि मिलने के बावजूद कई बच्चों और उनके अभिभावकों को इसका वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है। मामला सामने आने के बाद अब जिले में इसकी जांच की तैयारी शुरू हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस राशि का प्रावधान बच्चों की ड्रेस और किताबों के लिए किया गया है, वह वास्तव में उन्हीं पर खर्च हो रही है या निजी स्कूल प्रबंधन अपनी सुविधा के अनुसार इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

31,191 बच्चों के नाम पर 1.84 करोड़ की राशि

वर्ष 2025-26 में जिले के 562 निजी स्कूलों में RTE के तहत कुल 31,191 बच्चे अध्ययनरत रहे। शासन के प्रावधान के अनुसार प्रत्येक बच्चे के लिए गणवेश के लिए 541 रुपए और पुस्तकों के लिए 250 रुपए निर्धारित किए गए हैं। यानी एक विद्यार्थी के लिए कुल 791 रुपए की राशि तय है। 31,191 विद्यार्थियों के हिसाब से यह राशि करीब 1.84 करोड़ रुपए बैठती है। यही वजह है कि अब पूरे मामले में स्कूलवार भुगतान और उसके उपयोग की जांच की मांग उठ रही है। आरोप है कि भुगतान की प्रक्रिया में राशि निजी स्कूल प्रबंधन के खातों तक पहुंच जाती है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ बच्चों या उनके पालकों तक नहीं पहुंचता। यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि RTE के तहत मिलने वाली सुविधा के उद्देश्य पर भी सवाल खड़ा करता है।

RTE के तहत आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार दिया गया है। सरकार स्कूलों को इन विद्यार्थियों की शिक्षा से जुड़े खर्च के लिए निर्धारित राशि उपलब्ध कराती है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे या उनके पालक ही ड्रेस और किताबों का खर्च अपनी जेब से उठाने की बात कहते हैं। कुछ पालकों के मुताबिक, जब उन्होंने स्कूल प्रबंधन से ड्रेस और किताबों के लिए मिलने वाली राशि के बारे में जानकारी मांगी तो उन्हें कथित तौर पर बताया गया कि यह राशि स्कूल के खाते में आती है और स्कूल की जरूरत के हिसाब से खर्च की जाती है। अगर ऐसा है तो यह जांच का विषय है कि शासन द्वारा निर्धारित राशि का इस्तेमाल किस मद में किया जा रहा है और क्या उसका कोई रिकॉर्ड स्कूल प्रबंधन के पास मौजूद है।

बड़े स्कूलों में 40 से 62 हजार रुपए तक की राशि

जिन निजी स्कूलों में RTE के तहत विद्यार्थियों की संख्या अधिक है, वहां ड्रेस और पुस्तक मद की राशि भी हजारों रुपए तक पहुंच रही है। जानकारी के अनुसार कुछ बड़े स्कूलों में यह राशि 40 हजार से लेकर करीब 62 हजार रुपए तक होने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बच्चों के लिए निर्धारित यह रकम वास्तव में कहां और किस तरह खर्च की जा रही है। पालकों को यदि राशि के भुगतान और उपयोग की जानकारी ही नहीं है तो पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं।

गरीब परिवारों पर पड़ रहा अतिरिक्त आर्थिक बोझ

RTE के तहत निजी स्कूल में दाखिला मिलने से गरीब परिवारों को अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद रहती है। लेकिन अगर ड्रेस, किताब और अन्य जरूरी शैक्षणिक सामग्री का खर्च भी अभिभावकों को ही उठाना पड़े तो योजना का उद्देश्य प्रभावित होता है।कई परिवारों के लिए बच्चों की यूनिफॉर्म, किताबें और कॉपियों का खर्च भी अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है। ऐसे में सरकार की ओर से निर्धारित राशि का सही लाभ बच्चों तक पहुंचना बेहद जरूरी है। कुछ पालक स्कूल प्रबंधन से सवाल करने से भी बचते हैं। इसकी एक वजह यह आशंका बताई जाती है कि कहीं उनके बच्चे की पढ़ाई या दाखिले पर इसका असर न पड़े।सत्यापन के बाद स्कूलों को जारी होती है राशि

RTE के तहत दाखिले और भुगतान की प्रक्रिया में नोडल प्राचार्यों के सत्यापन की भूमिका होती है। इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ती है और निर्धारित राशि स्कूलों को जारी की जाती है। यहीं से अब निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि राशि स्कूलों को जारी होने के बाद बच्चों तक उसका लाभ नहीं पहुंचा, तो यह पता लगाना जरूरी है कि सत्यापन किस स्तर पर हुआ और भुगतान के बाद राशि के उपयोग की निगरानी कैसे की गई। अब मांग उठ रही है कि जिले के सभी संबंधित निजी स्कूलों का स्कूलवार भुगतान और भौतिक सत्यापन कराया जाए।किस कक्षा में कितने RTE विद्यार्थी?

वर्ष 2025-26 में जिले के निजी स्कूलों में RTE के तहत कुल 31,191 विद्यार्थी अध्ययनरत रहे। कक्षा के अनुसार आंकड़ों पर नजर डालें तो नर्सरी में 2,062, KG-1 में 2,794, KG-2 में 2,552 और पहली कक्षा में 4,079 विद्यार्थी शामिल हैं। वहीं दूसरी कक्षा में 3,540, तीसरी में 3,505, चौथी में 3,348 और पांचवीं में 2,323 बच्चे RTE के तहत पढ़ रहे हैं। छठवीं में 1,988, सातवीं में 1,680, आठवीं में 1,342, नौवीं में 886, दसवीं में 694, ग्यारहवीं में 291 और बारहवीं में 107 विद्यार्थी RTE के तहत अध्ययनरत रहे। इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक जिले में ही RTE के तहत कितने बच्चों को सरकारी सहायता का लाभ मिलना है।नए सत्र में 4,241 आवेदन, 1,404 बच्चों का दाखिला

वर्तमान सत्र 2026-27 में भी RTE के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया जारी है। जिले के 562 निजी स्कूलों में दाखिले के लिए अब तक 4,241 आवेदन प्राप्त हुए हैं। इन स्कूलों में RTE के तहत निर्धारित सीटों की संख्या 2,237 है। इनमें से अब तक 1,404 बच्चों का दाखिला हो चुका है, जबकि 833 सीटें अभी भी रिक्त हैं। ऐसे में पुराने सत्र की राशि को लेकर उठे सवालों के बीच नए सत्र में भी यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि RTE के तहत मिलने वाली सभी सुविधाएं बच्चों तक पारदर्शी तरीके से पहुंचें।

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