- मेरिट बनाम पदोन्न्ति में कोटा नीति पर न्यायालय में तीखी बहस
बिलासपुर।।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में शिक्षक भर्ती व अन्य आरक्षण रोस्टरों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में की गई एक गंभीर टिप्पणी के बाद नौकरियों में आरक्षण और पदोन्नति (प्रमोशन) में कोटे की व्यवस्था पर देशव्यापी बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया और कानूनी गलियारों में वायरल हो रहे इस अदालती संवाद के अनुसार, सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने सरकार के वकील के सामने यह सीधा सवाल उठाया कि यदि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उम्मीदवार अपनी योग्यता (Merit) के बल पर अनारक्षित (General) सीटें हासिल कर लेते हैं, और इसके बाद आगे चलकर पदोन्नति में भी आरक्षण का लाभ लेते हैं, तो ऐसी स्थिति में सामान्य वर्ग (General Category) के उम्मीदवारों के लिए क्या अवसर बचेंगे? इस तीखी टिप्पणी के सामने आने के बाद ‘डबल बेनिफिट’ (दोहरा लाभ) की व्यवस्था पर एक बार फिर कानूनी और सामाजिक स्तर पर सवाल उठने लगे हैं।
डबल बेनिफिट का पूरा गणित और सामान्य वर्ग की प्रमुख चिंताएं
सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों और आलोचकों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था व्यावहारिक रूप से ‘ओपन कैटेगरी’ के मूल सिद्धांत को प्रभावित कर रही है। इस व्यवस्था के तहत यदि कोई आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी बिना किसी रियायत (जैसे आयु या अंक में छूट) के सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक लाता है, तो उसे ओपन सीट दी जाती है। इसके बाद जब उसी विभाग में पदोन्नति की बारी आती है, तो उसे पुनः आरक्षित कोटे का लाभ मिल जाता है। आलोचकों का मानना है कि जब एक उम्मीदवार खुली प्रतियोगिता में सामान्य वर्ग के बराबर या उससे बेहतर प्रदर्शन कर चुका है, तो वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से सक्षम साबित हो चुका है। ऐसे में सेवा के भीतर दोबारा आरक्षण देना उन सामान्य वर्ग के युवाओं के साथ न्यायसंगत नहीं है, जिनके लिए खुली प्रतियोगिता के अवसर पहले ही बहुत संकुचित हो चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी स्टैंड और ओपन कैटेगरी का मूल सिद्धांत
इस पूरे विवाद पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में यह साफ किया है कि ‘अनारक्षित सीटें’ किसी जाति विशेष या सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित नहीं हैं, बल्कि वे पूरी तरह से ‘ओपन कैटेगरी’ (खुली श्रेणी) हैं। न्यायशास्त्र के अनुसार, यदि उच्च अंक लाने वाले किसी आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्र को ओपन कैटेगरी में सीट नहीं दी जाएगी, तो यह उसकी योग्यता (Merit) को नजरअंदाज करने जैसा होगा। अदालत का मानना है कि मेरिट सूची में शीर्ष पर रहने वाले उम्मीदवारों को उनकी जाति के आधार पर ओपन सीटों से वंचित नहीं किया जा सकता।
संविधान की व्यवस्था और यह सिलसिला कब तक चलने का है नियम
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4A) के तहत सरकार को यह शक्ति दी गई है कि वह SC और ST वर्गों के लिए पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है। देश के कानूनी नियमों के अनुसार, नौकरियों और पदोन्नति में आरक्षण का यह सिलसिला तब तक जारी रखने का प्रावधान है, जब तक राज्य सरकारें अपने डेटा के आधार पर संतुष्ट न हो जाएं कि सरकारी सेवाओं में इन वंचित वर्गों का ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ (Adequate Representation) हासिल हो चुका है। हालांकि, इस व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर ‘क्रीमी लेयर’ (आर्थिक रूप से समृद्ध वर्ग को बाहर रखना) के सिद्धांत को लागू करने और पदोन्नति में कोटा देने से पहले विभागों में पिछड़ेपन का मात्रात्मक डेटा (Quantitative Data) जुटाने जैसी कड़ी शर्तें अनिवार्य की हैं।









