सावन सोमवार क्यों मनाया जाता है? (धार्मिक महत्व और कथाएं)धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावन सोमवार मनाने के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण हैं:
माता पार्वती की कठिन तपस्या: पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए सावन के महीने में ही अत्यंत कठिन तपस्या की थी। उनकी इस अनन्य भक्ति और व्रत से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने सावन के सोमवार के दिन ही उन्हें अपनी अर्धांगिनी (पत्नी) के रूप में स्वीकार किया था। तभी से मनचाहा जीवनसाथी पाने और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए इस व्रत को रखने की परंपरा चली आ रही है।
समुद्र मंथन और विषपान: एक अन्य मान्यता के अनुसार, देवों और असुरों के बीच हुआ ऐतिहासिक समुद्र मंथन सावन के महीने में ही संपन्न हुआ था। इस मंथन से निकले भयंकर ‘हलाहल’ विष से पूरी सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ (गले) में धारण कर लिया था। विष की तीव्रता और गर्मी को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने शिव जी पर शीतल जल अर्पित किया था। इसी कारण सावन में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का विशेष महत्व है।
भोलेनाथ का पृथ्वी पर आगमन: माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान शिव अपनी ससुराल (राजा दक्ष के घर) आते हैं और इस दौरान वे पृथ्वी लोक पर ही निवास करते हैं। इसलिए इस समय की गई पूजा सीधे महादेव तक पहुंचती है।
सावन सोमवार की संक्षिप्त पूजा विधि इस दिन भक्तगण सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। इसके बाद शिव मंदिर या घर पर ही शिवलिंग का गंगाजल, कच्चे दूध, दही, शहद और घी (पंचामृत) से अभिषेक किया जाता है। पूजा के दौरान भगवान शिव को उनके प्रिय बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी के पत्ते और सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं तथा “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का निरंतर जाप किया जाता है।






