बिलासपुर(कमलकांत पाटनवार):- जिले में किसानों के डिजिटल पंजीयन को शत-प्रतिशत पूरा करने के प्रशासनिक दावों के बीच जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है। शासन द्वारा ऋण पुस्तिका में दर्ज प्रत्येक किसान का अलग-अलग पंजीयन अनिवार्य किए जाने से सरकारी रिकार्ड और मूल पहचान पत्रों में दर्ज नामों की विसंगतियां खुलकर सामने आ गई हैं। इस मामूली लिपिकीय त्रुटि को सुधारने के लिए राजस्व अमला ,सुधार करने के बजाय किसानों को शपथ पत्र और अन्य दस्तावेजों के नाम पर दफ्तरों के चक्कर कटवा रहा है। जिले के कुल 1 लाख 55 हजार 715 पीएम किसान हितग्राहियों में से अब तक 54 हजार 947 किसानों का पंजीयन नहीं हुआ है। इनमें अधिकांश मामले इसी पेचदगी की वजह से उलझे हुए हैं। किसानों के पास उपलब्ध मूल दस्तावेजों में नाम सही है, लेकिन राजस्व के पुराने डिजिटल पोर्टल पर मात्राओं की गलतियों या लिपिकीय चूक के कारण उनका आनलाइन ई-केवाईसी और एग्रीस्टैक सत्यापन खारिज हो रहा है। प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, पचपेड़ी तहसील में सर्वाधिक 7902, बेलतरा में 5389, बिल्हा में 5327 और मस्तूरी में 5145 किसानों का पंजीयन अटका पड़ा है। इसके अलावा पटवारी स्तर पर 1648 और तहसीलदार स्तर पर 200 सत्यापन के मामले लंबित हैं। नाम सुधार की जटिल प्रक्रिया के चलते डिजिटल क्राप सर्वे की प्रगति भी चरमरा गई है। जिले में कुल 5 लाख 84 हजार 766 खसरों में से अब तक सिर्फ 38 हजार 502 खसरों का ही सर्वे हो पाया है, जो कुल लक्ष्य का महज 6.58 प्रतिशत है। इनमें से भी राजस्व अमले ने केवल 7702 सर्वे को स्वीकृति दी है। यदि राजस्व विभाग ने त्रुटि सुधार के लिए सरल व्यवस्था नहीं बनाई, तो हजारों किसान समर्थन मूल्य पर धान खरीदी और सरकारी लाभ से वंचित हो सकते हैं।
चार तहसीलों में सर्वे का काम ठप जैसा हाल
डिजिटल क्राप सर्वे के सत्यापन में राजस्व अधिकारियों की सुस्ती साफ दिख रही है। बिलासपुर तहसील में 41,387 खसरों के मुकाबले अब तक एक भी सर्वे (0%) स्वीकृत नहीं हुआ है। सकरी में मात्र 1.26%, बोदरी में 1.70% और तखतपुर में 10.77% सर्वे ही मंजूर किए गए हैं। बेलगहना में 25,777 खसरों में से केवल 27 सर्वे को ही स्वीकृति मिल सकी है।
मात्रा की गलती पर मांग रहे शपथ पत्र
किसानों की मूल ऋण पुस्तिका और आधार में नाम सही होने के बावजूद सरकारी पोर्टल के डाटाबेस में दर्ज गलतियों का खमियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
राजस्व अमला सीधे सुधार करने के बजाय किसानों से नोटरी शपथ पत्र, वंशावली और हलफनामा मांग रहा है। इससे छोटे व सीमांत किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ रहा है और समय की बर्बादी हो रही है।














