- वार्ड-10 से युवा पत्रकार चेतन कापेवार का नाम चर्चा में, पार्षदों के जरिए उपाध्यक्ष पद पर नजर होने की राजनीतिक अटकलें
असलम रज़ा,बीजापुर/भोपालपटनम। नगरीय निकाय चुनाव की तारीखों का ऐलान भले ही अभी नहीं हुआ है, लेकिन भोपालपटनम नगर पंचायत में सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। इस बार चुनावी हलचल अध्यक्ष पद से ज्यादा पार्षदों के संभावित समीकरणों को लेकर दिखाई दे रही है। भाजपा और कांग्रेस के परंपरागत मुकाबले के बीच एक नए राजनीतिक विकल्प की सुगबुगाहट ने स्थानीय राजनीति को दिलचस्प बना दिया है।
इन दिनों नगर की राजनीतिक चर्चाओं में वार्ड क्रमांक 10 के युवा पत्रकार चेतन कापेवार का नाम तेजी से उभर रहा है। चर्चा है कि वे केवल अपने वार्ड तक सीमित रहने के बजाय नगर पंचायत के सभी 15 वार्डों में समर्थित प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे नगर पंचायत में पार्षदों का मजबूत समूह तैयार कर उपाध्यक्ष पद के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने की संभावित कवायद के रूप में देखा जा रहा है।
इस संभावित रणनीति का सबसे अहम पहलू भाजपा और कांग्रेस के भीतर असंतोष से उपजे समीकरण हो सकते हैं। सूत्रों के अनुसार दोनों दलों में उपेक्षित महसूस कर रहे नेताओं और नाराज कार्यकर्ताओं का समर्थन नए राजनीतिक विकल्प को मिल सकता है। हालांकि, इन चर्चाओं की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
युवा मतदाताओं का रुझान बदल सकता है चुनावी गणित
देशभर में जेन-जी के बीच पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों और युवाओं की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के बीच भोपालपटनम में भी युवा मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जा रही है। स्थानीय स्तर पर निर्दलीय और नए चेहरों को लेकर बढ़ती चर्चा ने भाजपा-कांग्रेस के रणनीतिकारों का ध्यान खींचा है।
चेतन कापेवार की पहचान युवा पत्रकार के साथ मिलनसार व्यक्तित्व और सामाजिक संपर्क रखने वाले व्यक्ति के रूप में है। कापेवार परिवार का भी नगर में अच्छा जनसंपर्क बताया जाता है। ऐसे में यदि वे विभिन्न वार्डों में समर्थित प्रत्याशियों को एकजुट करने में सफल होते हैं तो चुनाव के बाद बनने वाले पार्षदों के समीकरण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल यह पूरी कवायद चुनाव पूर्व राजनीतिक चर्चाओं और संभावित रणनीतियों तक सीमित है। लेकिन इतना तय है कि भोपालपटनम में इस बार मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटता नजर नहीं आ रहा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि युवा नेतृत्व के नाम पर बन रहा संभावित तीसरा समीकरण वास्तव में चुनावी मैदान में उतरता है या फिर यह केवल सियासी चर्चाओं तक ही सीमित रह जाता है।











