महाचेतना के शिखर श्रीकृष्ण: ओशो की वे क्रांतिकारी व्याख्याएं जिन्होंने अध्यात्म को उदासी से निकालकर उत्सव बना दिया

आध्यात्मिक गुरु ओशो ने भगवान श्रीकृष्ण को इतिहास का एकमात्र ऐसा व्यक्ति माना है जो संपूर्ण और समग्र हैं। ओशो का कहना था कि अतीत में जितने भी तीर्थंकर, पैगंबर या संत हुए, वे सब जीवन के किसी एक हिस्से को चुनते थे और दूसरे हिस्से को नकार देते थे। कोई संसार छोड़कर जंगलों की तरफ भाग गया, तो किसी ने शरीर को कष्ट देने को ही साधना मान लिया। लेकिन कृष्ण अकेले ऐसे पूर्ण अवतार हैं जो महलों में भी उतने ही सहज हैं जितने कि सुदामा की कुटिया में, जो युद्ध के मैदान में सुदर्शन चक्र उठाते हुए भी उतने ही शांत हैं जितने यमुना किनारे बांसुरी बजाते हुए। ओशो ने कृष्ण के इसी बहुआयामी रूप को ‘पूर्ण पुरुषत्व’ की संज्ञा दी और कहा कि कृष्ण को समझे बिना मनुष्य कभी अपने भीतर की पूरी संभावनाओं को नहीं जी सकता।ओशो की दृष्टि में कृष्ण का सबसे बड़ा योगदान जीवन को ‘लीला’ के रूप में देखना है। साधारण मनुष्य जीवन को एक गंभीर काम या संघर्ष (work) की तरह जीता है, जिससे तनाव और उदासी पैदा होती है। इसके विपरीत, कृष्ण पूरे जीवन को एक खेल (play) की तरह देखते हैं, जहाँ न तो कोई जीत का अहंकार है और न ही हार का कोई दुख। ओशो कहते थे कि कृष्ण का ‘रास’ कोई साधारण नृत्य नहीं है, बल्कि वह अस्तित्व के साथ पूरी तरह एक हो जाने की चरम अवस्था है। जब कोई व्यक्ति अपने अहंकार को पूरी तरह मिटाकर जीवन के उत्सव में डूब जाता है, तब उसके जीवन में भी कृष्ण की बांसुरी गूंजने लगती है। ओशो ने स्पष्ट किया कि कृष्ण ने कभी किसी को अपनी तरह बनने के लिए नहीं कहा, बल्कि उन्होंने हर व्यक्ति को अपनी अनूठी प्रकृति के अनुसार जीने की स्वतंत्रता दी।कृष्ण के गीता ज्ञान पर ओशो की व्याख्या परंपरावादियों को झकझोर देने वाली है। ओशो का मानना था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में कृष्ण अर्जुन को किसी युद्ध के लिए प्रेरित नहीं कर रहे थे, बल्कि वे उसे पलायनवाद से बचा रहे थे। अर्जुन अपने कर्तव्यों से भागकर सन्यासी बनना चाहता था, जिसे कृष्ण ने उसकी कमजोरी और अहंकार माना। ओशो के अनुसार, कृष्ण का संन्यास संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार के बीचों-बीच खड़े होकर भी भीतर से पूरी तरह अछूते रह जाना है। उन्होंने कृष्ण को भविष्य के मनुष्य का आदर्श बताया। एक ऐसा मनुष्य जो ध्यान भी कर सके और व्यापार भी, जो प्रेम में भी डूब सके और अपने उत्तरदायित्वों को भी पूरी कुशलता से निभा सके। ओशो के शब्दों में, आने वाली सदियों का मानव यदि मानसिक रूप से स्वस्थ रहना चाहता है, तो उसे कृष्ण के इस समग्र दर्शन को अपने जीवन में उतारना ही होगा।

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