विश्वनाथ देवांगन -राजनांदगांव ।संस्कारधानी राजनांदगांव का इतिहास और यहां की सांस्कृतिक विरासत बेहद समृद्ध रही है। लेकिन आज यही गौरवशाली विरासत बदहाल संरक्षण व्यवस्था के चलते धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती नजर आ रही है। जिला कार्यालय परिसर में स्थित पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में सैकड़ों और हजारों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक प्रतिमाएं, राजघराने के अस्त्र-शस्त्र, प्राचीन सिक्के, पारंपरिक वेशभूषा और कई दुर्लभ ऐतिहासिक वस्तुएं रखी गई हैं। ये धरोहरें केवल पुरानी वस्तुएं नहीं, बल्कि राजनांदगांव के इतिहास और संस्कृति की जीवंत निशानियां हैं।
लेकिन इन अमूल्य धरोहरों की मौजूदा स्थिति देखकर संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कई प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, कुछ के अवशेष जमीन पर बिखरे नजर आते हैं और कई ऐतिहासिक वस्तुएं धूल और उपेक्षा के बीच पड़ी हुई हैं।
जिस भवन में इन धरोहरों को सुरक्षित रखा गया है, उसकी हालत भी चिंता बढ़ाने वाली है। भवन की दीवारों पर दरारें दिखाई दे रही हैं, कई जगह जमीन धंस चुकी है और संरचना भी जर्जर नजर आ रही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब भवन ही सुरक्षित नहीं है तो उसके भीतर रखी सदियों पुरानी धरोहरें आखिर कितनी सुरक्षित हैं?
सबसे बड़ा सवाल यहां जारी होने वाले मेंटेनेंस फंड को लेकर भी सामने आ रहा है। जानकारी के मुताबिक मेंटेनेंस के नाम पर लाखों रुपये का फंड जारी हुआ है और उस राशि पर ब्याज भी जमा हो चुका है।
इसके बावजूद संग्रहालय में न तो अपेक्षित मरम्मत दिखाई दे रही है और न ही धरोहरों के संरक्षण के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं नजर आ रही हैं। आखिर मेंटेनेंस के लिए जारी राशि का इस्तेमाल कहां और किस तरह किया गया, यह सवाल अब जांच का विषय बनता दिखाई दे रहा है।
वहीं संग्रहालय में कर्मचारियों की कमी भी व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। नियमित साफ-सफाई, वैज्ञानिक संरक्षण और ऐतिहासिक वस्तुओं की देखरेख के लिए पर्याप्त स्टाफ नहीं होने की बात सामने आ रही है। आम लोगों की पहुंच भी सीमित है, जिसके चलते यहां प्रतिदिन गिनती के लोग ही पहुंचते हैं।
इस पूरे मामले में जब जिम्मेदार अधिकारियों से कैमरे के सामने जवाब जानने की कोशिश की गई तो अधिकारी सामने आने से बचते नजर आए। संयुक्त कलेक्टर शीतल बंसल ने कहा कि वे इस संबंध में जानकारी देने के लिए अधिकृत नहीं हैं और एडीएम से जानकारी लेने की बात कही।
अब सवाल यही है कि राजनांदगांव की अमूल्य ऐतिहासिक धरोहरों को आखिर कब मिलेगा उचित संरक्षण? लाखों रुपये के फंड के बावजूद अगर धरोहरें इसी तरह बदहाल रहीं, तो आने वाली पीढ़ियां इतिहास की इन अनमोल निशानियों को केवल तस्वीरों में ही देख पाएंगी।








