स्वच्छता से कोसों दूर सोयदा गांव, टूटे रिक्शों के भरोसे स्वच्छ भारत मिशन!

जियाउल खान ,लखनपुर /सरगुजा । सालभर से कचरा कलेक्शन बंद, पुआल के नीचे धूल फांक रहे स्वच्छता रिक्शे; सेग्रीगेशन शेड के अभाव में व्यवस्था बदहाल, स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने उठाए सवाल

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने और देश को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाने के उद्देश्य से 2 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता बनाए रखने, घरों से कचरा एकत्रित करने, ठोस एवं तरल अपशिष्ट का उचित प्रबंधन करने और लोगों को स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इस योजना को संचालित किया जा रहा है। लेकिन सरगुजा जिले के लखनपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत चांदो के आश्रित ग्राम सोयदा की जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है। यहां स्वच्छता के नाम पर कहीं टूटे-फूटे रिक्शे पड़े हैं, तो कहीं शौचालय अनुपयोगी स्थिति में हैं। वहीं, ग्रामीणों के घरों से कचरा संग्रहण की व्यवस्था लंबे समय से ठप पड़ी है।

पुआल के नीचे पड़े रिक्शे, कचरा उठाव व्यवस्था ठप

ग्राम सोयदा में स्वच्छ भारत मिशन की जमीनी स्थिति का जायजा लेने पर पता चला कि कचरा संग्रहण के लिए उपलब्ध कराए गए रिक्शे टूट-फूटकर अनुपयोगी हो चुके हैं। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ महीनों तक घर-घर जाकर कचरा संग्रहण किया जाता था, लेकिन रिक्शे खराब होने के बाद यह व्यवस्था धीरे-धीरे बंद हो गई। स्थिति यह है कि लंबे समय से घरों से नियमित कचरा उठाव नहीं हो रहा है।

वहीं, कचरे को अलग-अलग रखने और उसके उचित प्रबंधन के लिए गांव में सेग्रीगेशन शेड की व्यवस्था भी नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब कचरा संग्रहण के साधन ही खराब पड़े हों और कचरे के निस्तारण के लिए निर्धारित स्थान तक उपलब्ध न हो, तो गांव में स्वच्छता व्यवस्था कैसे कायम रह सकती है?

आम के पेड़ के नीचे जमा होता रहा कचरा, बारिश में फैली दुर्गंध

स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने बताया कि शुरुआती दिनों में वे घरों से कचरा एकत्रित करती थीं। रिक्शा खराब होने और सेग्रीगेशन शेड नहीं होने के कारण कुछ समय तक एकत्रित कचरे को एक घर के आम के पेड़ के नीचे रखा जाता था। समूह की सदस्य फिलिसिता ने बताया कि बरसात के मौसम में जमा कचरे से दुर्गंध आने लगी, जिससे आसपास रहने वाले लोगों को परेशानी होने लगी।

उनके अनुसार, भारी बारिश के दौरान कुछ कचरा बह गया, जबकि कुछ कचरे को बच्चों ने ठंड के मौसम में आग जलाने के लिए इस्तेमाल कर लिया। यह स्थिति न केवल कचरा प्रबंधन की बदहाल व्यवस्था को उजागर करती है, बल्कि इससे पर्यावरण और ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर भी चिंता पैदा होती है।

मानदेय भुगतान पर भी उठे सवाल

कचरा संग्रहण का कार्य करने वाली स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने मानदेय भुगतान को लेकर भी अपनी परेशानी बताई। महिलाओं के अनुसार, मानदेय की राशि सचिव के खाते में आती है, लेकिन पिछले वर्ष और चालू वर्ष को मिलाकर उन्हें केवल एक-एक बार ही भुगतान मिला है। समूह की महिलाओं ने बताया कि इस वर्ष उन्हें कुल 12 हजार रुपये ही प्राप्त हुए हैं।

महिलाओं का कहना है कि घरों से कचरा उठाने के दौरान कुछ लोगों के साथ विवाद की स्थिति भी बनती थी। इस संबंध में उन्होंने सचिव रजंति तिर्की और सरपंच को जानकारी दी थी, लेकिन उनके अनुसार समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई।

शौचालय बने, लेकिन उपयोग और रखरखाव पर सवाल

गांव में स्वच्छता की बदहाली केवल कचरा संग्रहण तक सीमित नहीं है। कई शौचालय खराब स्थिति में नजर आते हैं, जबकि कुछ का उपयोग शौच के बजाय घर का सामान रखने और अन्य कार्यों के लिए किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि शौचालयों का निर्माण कराने और गांव को खुले में शौच मुक्त घोषित करने के बाद उनके रखरखाव, मरम्मत और नियमित उपयोग की निगरानी कौन करेगा?

स्वच्छता अभियान का उद्देश्य केवल शौचालयों का निर्माण कराना या गांव को ओडीएफ घोषित करना नहीं, बल्कि इन सुविधाओं को उपयोगी बनाए रखना और ग्रामीणों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना भी है। यदि निर्मित शौचालय अनुपयोगी हो जाएं और कचरा संग्रहण की व्यवस्था बंद हो जाए, तो योजना के वास्तविक उद्देश्यों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सरपंच ने टिप्पणी से किया परहेज, सचिव ने पेट्रोल खर्च लेकर मामला रफा दफा की बात कही

इस मामले में पक्ष जानने के लिए सरपंच से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने इस विषय पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। सचिव से बातचीत के दौरान उन्होंने कथित तौर पर पेट्रोल खर्च लेकर मामले को रफा-दफा करने की बात कही।

टूटे रिक्शे और बंद कचरा उठाव व्यवस्था ने खोली पोल

सोयदा की स्थिति ने पंचायत स्तर पर स्वच्छता योजनाओं के संचालन और निगरानी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या पंचायत की जिम्मेदारी केवल योजना के तहत संसाधन उपलब्ध कराने तक सीमित है? क्या सरपंच और सचिव की जिम्मेदारी नहीं बनती कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग सुनिश्चित करें और खराब उपकरणों की मरम्मत कराएं? क्या जनपद स्तर पर योजनाओं की नियमित निगरानी और समीक्षा की व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू हो रही है?

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए कचरा संग्रहण के साधनों की मरम्मत, सेग्रीगेशन शेड का निर्माण, कचरे के सुरक्षित निस्तारण और स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को नियमानुसार मानदेय भुगतान जैसी व्यवस्थाओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

संजीवनी का इंतजार, कब सुधरेगी सोयदा की तस्वीर?

ग्राम सोयदा की स्वयं सहायता समूह की महिलाएं अब सेग्रीगेशन शेड और कचरा संग्रहण के लिए नए या मरम्मत किए गए रिक्शों की मांग कर रही हैं, ताकि घर-घर से कचरा उठाव का काम दोबारा शुरू हो सके। ग्रामीणों को उम्मीद है कि संबंधित अधिकारी इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक कार्रवाई करेंगे।

अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी सोयदा की बदहाल स्वच्छता व्यवस्था को सुधारने के लिए कब पहल करते हैं। क्या टूटे रिक्शों की मरम्मत होगी, सेग्रीगेशन शेड बनेगा और कचरा संग्रहण फिर से शुरू होगा, या स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य सरकारी कागजों तक ही सीमित रह जाएगा? फिलहाल सोयदा की स्थिति व्यवस्था की जवाबदेही और योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

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